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August 9, 2026, 1:56 pm
NEWS : जिज्ञासा ही ज्ञान का प्रथम द्वार, प्रभु स्मरण से करें दिन की शुरुआत- अभिनव मुनि, पढे़ रेखा खाबिया की खबर

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चित्तौड़गढ़। गांधीनगर स्थित नानू नवकार भवन में चल रही चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में आचार्य विजय राज जी म. सा. के अज्ञानुवर्ती अभिनव मुनि जी म. सा. ने धर्मसभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि जिज्ञासा ही ज्ञान का प्रथम द्वार है। हमें दिन की शुरुआत वंदन-नमन और प्रभु स्मरण के साथ करनी चाहिए। प्रातः उठकर तीन बार वंदन कर प्रभु का स्मरण करना चाहिए।

उन्होंने पूछिसुणम की दूसरी गाथा का उल्लेख करते हुए बताया कि जम्बू स्वामी ने सुधर्मा स्वामी से चार प्रश्न किए थे। उन्होंने कहा कि शब्दों में बहुत शक्ति होती है। शब्द कभी प्रेम की गंगा बहा देते हैं तो कभी विकराल रूप भी दिखा सकते हैं। श्रावक का विश्वास होता है कि प्रभु ने जो कहा है, वह सत्य है। भगवान ने अभय और मैत्री का संदेश दिया। अपनी आत्मा को भयमुक्त बनाने के लिए संसार के सभी जीवों से मैत्री भाव रखना आवश्यक है। उन्होंने जीव और अजीव के भेद को भी समझाया।

इससे पूर्व दिव्यम मुनि ने कहा कि चातुर्मास में संत-सतियों का सानिध्य प्राप्त हो रहा है, जिसका सदुपयोग कर जीवन की दरिद्रता को समाप्त करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज फास्ट फूड और फास्ट मनी का दौर है, जिसके कारण लोभ और लालच भी बढ़ता जा रहा है। यदि लोभ की ऊर्जा को सद्कार्यों में लगाया जाए तो जीवन आनंदमय बन सकता है।

उन्होंने कहा कि मंदिर के चढ़ावे में भी चोरी होने लगी है। ऐसा करने वाले लोग स्वयं अपने जीवन में दरिद्रता ला रहे हैं। मनुष्य की इच्छाएं अनंत हैं और संग्रह में विग्रह होता है। हमें अपने जीवन में सद्गुणों का विकास कर श्रावक के गुणों को धारण करना चाहिए। प्रतिक्रमण और सामायिक सूत्र को याद कर सद्बुद्धि का विकास करना चाहिए तथा नवकार भवन में मिलने वाले आध्यात्मिक अवसरों का सदुपयोग करना चाहिए।

साध्वी मयंक मणि म. सा. ने कहा कि गति और स्थिति, प्रकृति और निवृत्ति का अपना क्रम है। आठ माह गति का समय है, जबकि चातुर्मास के चार माह स्थिति और साधना के हैं। चातुर्मास में निवृत्ति लेकर तप, त्याग, ज्ञान और ध्यान में समय लगाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जितनी तड़पन सांस लेने के लिए होती है, उतनी ही मोक्ष प्राप्ति की हो जाए तो जीवन सुधर सकता है।

सभा के अंत में मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को प्रत्याख्यान करवाए तथा मंगल पाठ सुनाया।

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