चित्तौड़गढ़। उदयपुर में जल संरक्षण एवं जागरूकता के संदर्भ में आयोजित खोज यात्रा के अगले पड़ाव के रूप में भारत के वाटर मैन राजेंद्र सिंह अल्प प्रवास पर चित्तौड़ पहुंचे। मीरा नगर स्थित भारतीय सांस्कृतिक निधी परिषद इंटेक् चौप्टर के मुख्यालय पर संयोजक डॉ. सुशीला लड्ढा, सदस्य शांतिलाल भराडिया, भरत माहेश्वरी, डॉ कुंदन जैन, विजय अजमेरा,डॉ गोपाल सालवी एवं सह संयोजक मनीष मालीवाल ने मेवाड़ी परंपरा से स्वागत किया। इसी दौरान डॉ.सुशीला लड्ढा ने मीरा की भक्ति पर आधारित मीरायन एवं स्वयं के द्वारा रचित पुस्तकों का सेट एवं एवं डॉ. गोपाल सालवी ने जल प्रबंधन आलेख वाली वाटर हेरिटेज ऑफ इंडिया नामक पुस्तक भेंट की।
इस दौरान परिचय देते हुए डॉ. गोपाल सालवी ने बताया कि भारत के वाटर मैन के नाम से प्रसिद्ध राजेंद्र सिंह पिछले 46 वर्षों से जल संरक्षण का कार्य कर रहे हैं। जल संरक्षण के संदर्भ में राजस्थान में 11800 जल संरचनाएं बनवाकर 1200 गांवों को पानीदार बनाकर 10 लाख लोगों को लाभान्वित किया है। देशभर में आपने 12 से अधिक नदियों को पुनर्जीवित किया है और 60 से अधिक देशों में जल संरक्षण यात्राएं की है। राजेंद्र सिंह के द्वारा जल साक्षरता, जंगल बचाओ -जीवन बचाओ एवं जल नीति पर श्वेत पत्र जारी करने सहित कई चर्चित अभियान चलाएं हैं। राजस्थान में अलवर में पर्यावरण के लिए कार्य करने वाली तरुण भारत संघ संस्था भी चलाते हैं राजेंद्र सिंह को 2001 में रमन मैग्सेसे पुरस्कार दिया गया ,2015 में स्टॉकहोम जल पुरस्कार दिया गया जिसे पानी के लिए नोबेल पुरस्कार भी कहा जाता है। राजेंद्र सिंह कहते हैं कि जल हमें ही नहीं पृथ्वी एवं पर्यावरण को बचाने के लिए भी बेहद आवश्यक है। लेकिन जब तक हम पानी का असली मोल नहीं समझेंगे तब तक पानी के संरक्षण की दिशा में कोई सार्थक कार्य नहीं किया जा सकता है। राजेंद्र सिंह ने 1980 के दशक में पानी की समस्या पर कार्य शुरू किया उन्होंने वर्षा के जल को भूमि के भीतर पहुंचाने की परंपरागत प्रणाली को अपनाकर गांव वालों की मदद से जगह-जगह छोटे पोखर बनाना प्रारंभ किया ।पश्चिमी राजस्थान में मुल्तानी मिट्टी वाले क्षेत्रों में वर्षा के पानी को सहेजने हेतु खड्डीनें बनाई एवं कई जगह जोहड़ों का निर्माण भी करवाया गया जिससे मानव -पशु सहित सभी प्राणियों को पेयजल के स्त्रोत विकसित हुए।इन जल स्त्रोतों में वर्षा के जल भरने से भूजल स्तर में भी वृद्धि हुई। नदियों, तालाबों, प्राचीन बावडियों सहित परंपरागत जल स्त्रोत नहीं बचाए गए तो जीवन संकट में पड़ जाएगा। हर किसी को पानी बचाने की पहल करनी होगी केवल सरकार के भरोसे ही न बैठे रहे।
इंटेक टीम के साथ चित्तौड़ दुर्ग पर पहुंचकर राजेंद्र सिंह ने यहां के जल प्रबंधन की कुशल व्यवस्था को सराहा। और बताया कि चित्तौड़ दुर्ग पर पर स्थित सभी कुंडों में जल का स्थानांतरण आपस में होता रहता है। जिससे जल की शुद्धता भी बनी रहती है। यहां की विभिन्न जल संरचनाओं मे खातन बावड़ी, भीमलत कुंड, चतरंगमोरी, नील बाव,रत्नेश्वर तालाब एवं कुकड़ेश्वर कुंड को बारीकी से देखा एवं विशेष गौमुख कुंड को प्राचीन भू जल अभियांत्रिकी का उदाहरण बताया। इसी दौरान इंटेक् चौप्टर सदस्य, कृषि अभियंत्रिकी प्रोफेसर कुंदन जैन ने सबसोइलिंग पद्धति से भी वाटर मैन को अवगत कराया इसमें बताया कि कृषि जमीन मे जल सोखने से संग्रहण शीलता में वृद्धि होती है। जिससे जलस्तर बढ़ता है। जानकारी देते हुए डॉ. सुशीला लड्ढा ने बताया की चित्तौड़ दुर्ग यात्रा के बाद राजेंद्र सिंह ने चित्तौड़ इंटेक् चौप्टर की गतिविधियों को सराहा और साथ ही गांधी दर्शन से जुड़े शांति एवं अहिंसा निदेशालय के संबंध में भी चर्चा की।