नीमच। आत्म शांति का नाम सम्यक दर्शन होता है। गलती होने पर क्षमा मांगने के बाद ही समाधि का मार्ग मिलता है। संसार में आत्मा के अलावा मेरा कुछ नहीं होता है। संसार की जितनी भी विभूतियां है यह सभी पुण्य का पर्याय है। आत्मा के ज्ञान की साधना के बिना समाधि नहीं होती है। यह बात वैराग्य सागर जी महाराज साहब ने कही। वे पार्श्वनाथ दिगंबर जैन समाज नीमच द्वारा दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित धर्म सभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ति के लिए किये गये स्नान में होने वाली जीव हिंसा से पाप कम लगता है। शरीर के सौंदर्य के लिए किये गये स्नान की जीव हिंसा में पाप ज्यादा लगता है। रामायण युग में माता सीता जंगल में रहते हुए भी त्यागी वृति साधु संतों के लिए मिट्टी के बर्तन बनाती थी और साधु संतों को दान करती थी। संतो को आहार दान करने पर जो पुण्य मिलता है वह संसार में और कहीं नहीं मिलता है। सत्कार करने के लिए मन में अतिथि सत्कार की भावना होनी चाहिए तभी वह फल पुण्य होता है।
वर्धमानसागर जी महाराज के सुशिष्य मुनि सुप्रभ सागर जी मसा ने कहा कि धर्म पवित्र है तो विष भी अमृत बन जाता है ।भगवान की भक्ति में विष भी अमृत बन जाता है। जैन धर्म का पालन करें तो शत्रु भी मित्र बन जाता है। जो भगवान की भक्ति करते हैं तो देवता भी उनकी रक्षा करते हैं। धर्म के बिना देवता भी रक्षा नहीं करते हैं ।पाप कर्म का उदय होगा तो देवता भी रक्षा नहीं कर सकते हैं। पुण्य प्रबल होता तो राक्षस भी कुछ नहीं कर सकते हैं। धर्म पवित्र हो तो रत्नों की बरसात होती है। तीर्थंकरों ने पूर्व में धर्म किया तो उनके आंगन में रत्नों की वर्षा हुई है।
परम पूज्य चारित्र चक्रवर्ती 108 शांति सागर जी महामुनि राज के आचार्य पदारोहण के शताब्दी वर्ष मे परम पूज्य मुनि 108 श्री वैराग्य सागर जी महाराज एवं परम पूज्य मुनि 108 श्री सुप्रभ सागर जी महाराज जी का पावन सानिध्य मिला। उक्त जानकारी दिगम्बर जैन समाज एवं चातुर्मास समिति के अध्यक्ष विजय विनायका जैन ब्रोकर्स, मिडिया प्रभारी अमन विनायका ने दी।