चित्तौड़गढ़। सेती शांति भवन में साध्वी विजयप्रभा ने आज अपनी व्याख्यान माला में सात्विक भोजन का महत्व विषय पर विचार रखे। आपने कहा कि एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रीय जीव सभी भोजन करते है किन्तु महापुरुषो ने बताया कि हमारा भोजन सात्विक होना चाहिए। जो भोजन हम करते है पेट मे जाने के बाद परिणाम भजन के रूप मे आए यही सर्वश्रेष्ठ भोजन है। धर्मआराधना व त्याग तपस्या का परिणाम परफेक्ट आना चाहिए। घर में बहु माँ पत्नि या बहन के द्वारा बनाया गया भोजन सात्विक है। बाजार का भोजन असात्विक है। पीजा बर्गर आदि असात्विक है। जैसा खाए अन्न वैसा होगा मन। मन को पवित्र रखने के लिए भोजन एवं वाणी को पवित्र रखने के लिए पानी की आवश्यकता है। भोजन बनाया खाया व परोसा गुस्से में होता है तो प्रेम कहाँ से आएगा। हम रसोई को किचन कहते है इसका अर्थ हैं किच किच जहां किच किच हो वहाँ प्रेम कहाँ से आएगा। रसोई में रस टपकता है। रसोई में भोजन करने वाले को भजन की आवश्यकता होती है।
नवकार महामंत्र का जाप चौबीस घंटे शांति भवन में निरन्तर गतिमान है। आज की नाटिका सुसंस्कारों का महत्व का मंचन जैन दिवाकर महिला मंडल से श्वेता सेठिया एण्ड टीम ने किया।
बुधवार को बड़ा कल्प का विशेष दिन हैं जिसके लिए श्राविकाएं मंदिरों में गवरी एवं उपवास आदि प्रत्याख्यान रखेगी।