चित्तौड़गढ़। रामद्वारा में चातुर्मास के दौरान अंतर्राष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के संत दिग्विजय राम ने भारतीय धर्म सभा में कथा को संबोधित करते हुए कहा कि भक्तों की श्रद्धा और प्रेम के कारण भगवान को अपने भक्तों के लिए बनाए गए नियम भी बदलने पड़ते है।
संत ने कहा कि शिव पुराण अनुसार शीलाद नामक एक धर्मात्मा मुनि थे पितरों के आदेश से उन्होंने अयोनिज, सुव्रत, मृत्युहीन पुत्र की प्राप्ति के लिए तप करके इंद्र को प्रसन्न किया परंतु देवराज इंद्र ने ऐसा पुत्र प्रदान करने में अपने आप को असमर्थ बताया और महादेव की आराधना करने का आदेश दिया। शिलाद मुनि भगवान महादेव को प्रसन्न करने के लिए तप करने लगे। उन्होंने 1000 वर्ष तक तप किया तब शिवजी प्रसन्न होकर शिलाद मुनि को वर मांगने के लिए आदेश देते हैं। ऋषि कहते कि प्रभु आपके ही समान पुत्र चाहता हूं भगवान शिव शीलाद ऋषि से कहते हैं कि तुमने बहुत कठिन तपस्या करके मुझे प्रसन्न किया है मैं स्वयं तुम्हारे यहां पुत्र के रूप में आऊंगा तथा तुम मेरे पिता बनोगे तथा मेरा नाम नंदी होगा। शिलाद ऋषि यज्ञ करते हैं मैं शंभू की आज्ञा से यज्ञ से पूर्व उनके शरीर से बालक का जन्म होता है चारों ओर प्रसन्नता छा जाती है सब आनंद की अनुभूति करते हैं। तदांतर में उसका नाम नंदी पड़ता है l जब नंदी शिलाद ऋषि की कुटिया में पहुंचते हैं तब नंदी मनुष्य रूप धारण कर लेते हैं। शिलाद ऋषि नंदी को वेद, वेदांत, धर्म की शिक्षा देते हैं। कुछ समय बाद भगवान शिव की आज्ञा से मित्र और वरुण नामक दो मुनि नंदी को देखने के लिए शिलाद ऋषि के आश्रम आते हैं। वह नंदी को देखकर बताते हैं कि इसकी उम्र 01 वर्ष से ज्यादा नहीं है शीलाद बड़े चिंतित हो जाते हैं और बड़े दुखी होते हैं। अपने पिता को दुखी देखकर नंदी पूछता है कि आप दुखी क्यों हैं तो शीलाद पूरा विवरण सुनाते हैं और कहते हैं पुत्र तुम्हारी आयु बहुत कम है तो नंदी जी कहते हैं कि आप चिंता नहीं करें मेरी आयु पूर्ण होगी मुझे कोई भी नहीं मार सकता है। मैं न तो तप से मृत्यु को हराऊंगा और नहीं विद्या से मैं केवल महादेव के भजन से मृत्यु को जीत लूंगा। भजन के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय से मृत्यु को नहीं जीता जा सकता। यह कहकर नंदी पिता के चरणों में प्रणाम कर भजन की राह पकड़ लेते हैं। आगे चलकर भगवान नंदी पर प्रसन्न होकर वरदान देते हैं कि तुम मेरे ही अंश हो अतः तुम मेरे साथ रहोगे जहां मैं रहूंगा वहां तुम रहोगे। अतः आज भी भगवान शंकर के मंदिर में नंदी का निवास होता है अर्थात भगवान को अपने भक्तों के लिए बनाए गए नियम भी बदलने पड़ते है।