चित्तौड़गढ़। तेरापंथ सभा के मंत्री ललित सुराना ने बताया कि शतावधानी मुनि संजय कुमार ने मीरा नगर स्थानक पर्युषण आराधना में आचारांक सत्र का वाचन कर भगवान महावीर के 27 भवों का इतिहास बता कर, महावीर के जन्म कल्याण का इतिहास बताया गया।
मुनि श्री ने कहा कि जैन धर्म के तीर्थंकर की प्रतिभा असाधारण होती है। जन्म से अवधि ज्ञानी होते हैं। 63 शलाका पुरूष में होते हैं। सबसे मजबूत शरीर होता है। साधना काल में उग्र तपस्वी होते हैं। केवल ज्ञान प्राप्ति तक 12 वर्ष मौन रहते हैं। महावीर ने 12 वर्ष में केवल 1 घंटा नींद ली, उसमें भी शुभ आभास स्वप्न आए। एक रात्रि को 20 मारणांतिक कष्ट केवल संगम देव ने दिए। सामान्य व्यक्ति हो तो 20 बार मर जाए, किन्तु उन कष्टों में भी समता, गुस्सा नहीं, इसीलिए कहा- क्षमा (सहन) करने में तीर्थंकर सबसे ज्यादा वीर क्षमा शूर होते हैं।
मुनि प्रसन्न कुमार ने वाणी संयम पर कहा- जैसे सुख से निर्विघ्न जीने के लिए खाने का संयम जरूरी है वैसे बोलने का संयम जरूरी है। 4 भाषा- सत्य, मिश्र, असत्य और व्यवहार भाषा। इन 4 में से दो सत्य व व्यवहार सोच कर बोलना। भले सत्य भाषा अच्छी है, काने या चोर को चोर कहना कटू सत्य हो जाता है। सूरदासजी कहना कटू सत्य नहीं होता। असत्य व मिश्र भाषा तो बोलना ही नहीं। कभी कभी नहीं बोला इसका दुःख नहीं होता है किन्तु क्यों बोला इसका दुःख सताता है। बोलना सिखाने से पहले चुप रहना सिखाना जरूरी है। प्रश्नालिटी डवलपमेन्ट। व्यक्तित्व विकास कार्यशाला में बोलने, नहीं बोलने, सोचमर बोलने के अनेक गुर शब्द किसी क हृदय में लग जाए तो जनम जनम वैर की परम्परा को बढ़ा देता है। कांटा शूल मीर तो निकल कर दवा उपचार से ठीक किया जा सकता है। जाती सूचक शब्द कभी नहीं बोलना चाहिए। आजकल राजनेता, धर्म नेता के भाषणों शब्दों की समीक्षा होती है। आपत्तिजनक शब्द बोलना विवादास्पद होता है। आवेश में बोलने का मतलब महिनों से बंद गटर के ढक्कन को खोलना है। बोलना जरूरी है तो नहीं बोलना ज्यादा जरूरी है। काष्टा मौन जिसमें हाथ हावभाव आदि के इशारे भी नहीं होते हैं। वाचाल ज्यादा बोलता है। दूसरे पर प्रभाव मौन का जो होता है वह बोलने से कभी कभी नहीं होता है। कोयल मधुरवाणी से प्रिय लगती, कौए के कटू वचन से पत्थर मारते। परिवार, समाज में ज्यादा टकराव, बिखराव, संघर्ष, बोली (भाषा) के असंयम से होता है। मुनि प्रकाश कुमार मुनि धैर्य कुमार ने भी उपदेश दिया।