सरवानिया महाराज। नाम भले ही उसका सोनी है लेकिन होनी को कौन टाल सकता है, उपर वाले ने सोनी की किस्मत में ऐसी होनी लिखा होगा यह किसी ने कभी सोचा नहीं होगा। कि पढ़ने की उम्र में दो वक्त की रोटी की भुख सोनी को सड़क पर खिंच लायेगी , वो दो रोटी के लिए मजबूर थी लोगों ने उसकी मजबूरी को तमाशा समझा और खुब तालियां बजाई।
जी हां मैं बात कर रहा हूं इन दिनों सरेराह भीड़भाड़ वाले इलाकों के बाजार में या सड़क किनारे आजकल एक रिक्शावाला गांव गांव शहर शहर घूम रहा है और उस रिक्शे पर सवार एक कम उम्र की लड़की जिसने अभी अपना बचपन भी जिया नहीं था और परिवार को पालने की जिम्मेदारी उठानी पड़ रही है ।
शहर में आज नीमच सिंगोली सड़क किनारे अनाउंसमेंट की आवाज कानों में पड़ी, कि एक बालिका रस्सी पर चलेगी ऐसा तमाशा दिखायेंगी की आप दांतों तले उंगली दबा लोगें और जब रुक कर देखा तो वाकई में एक बालिका जिसकी उम्र लगभग आठ दस साल होगी जो जमीन से आठ दस फीट ऊपर पाईपों के सहारे बंधी एक रस्सी पर बेखो़फ होकर चलकर और माथे पर वजन उठाकर लोगों का मनोरंजन कर रही थी । निचे रिक्शे में लगे अनाउंसमेंट में उसके पिता उसके इस दम फुलाने वाले करतब की प्रशंसा कर रहे थे। दर्शक और राहगीर इस करतब को देखकर निचे रखी थाली में कोई दस बीस पचास रुपए बतौर इनाम रख रहे थे। और इसी थाली में आयें पैसे से उसका परिवार पल रहा है । ये बात दिगर है कि जिस बचपन को स्कूल में होना था वो बचपन परिवार के पेट पालने सड़क पर करतब दिखाते नजर आ रहा है और आजकल ऐसे नजारे आम बात है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों के मक्कार और लापरवाह अधिकारियों के ये दावें की देश में अब कोई निरक्षर नहीं रहेगा। पढ़ेगा बचपन तो आगे बढ़ेगा भारत केवल और केवल दिखावे है। सरकारी हाथी की केवल झुठी चित्कार है। अगर यह गलत है तो फिर क्यों जिला प्रशासन की नज़र इस रिक्शेवाले पर नहीं पड़ी क्यों हजार हाथ वाले शासन को इस बालिका का बचपन यूं सड़क पर तमाशा बनता नज़र नहीं आया।