नीमच। वैराग्य सागर जी महाराज साहब एवं सुप्रभ सागर जी महाराज साहब की पावन निश्रा में पार्श्वनाथ दिगंबर जैन समाज नीमच द्वारा दिगम्बर जैन मंदिर में पर्युषण पर्व पर 10 उपवास की तपस्या करने वाले तपस्वियों का वरघोडा निकाल कर तपस्वियों का बहुमान किया गया।
दिगंबर जैन समाज नीमच एवं चातुर्मास समिति अध्यक्ष विजय विनायका जैन ब्रोकर्स, मीडिया प्रभारी अमन विनायका ने बताया कि पर्युषण पर्व के पावन उपलक्ष्य में समाज के अनेक व्यक्तियों ने 10 दिवसीय संस्कार प्रशिक्षण शिविर में सहभागिता निभाई।और10 दिन के उपवास की तपस्या की गई। उन तपस्वियों के बहुमान में दिगंबर जैन समाज नीमच द्वारा नगर में भव्य वरघोड़ा निकाला गया।
शोभा यात्रा में सबसे आगे दो घुड़सवार चल रहे थे उसके साथ ही बैण्ड बाजे पर तपस्या पर आधारित विभिन्न भजन कीर्तन की स्वर लहरिया बिखर रही थी ।उसके साथ ही समाज जन के साथ मुनि वैराग्य सागर जी महाराज, मुनी सुप्रभ सागर जी महाराज पैदल चल रहे थे। और समाज जन इंद्र के परिधानों में भगवान पार्श्वनाथ का चांदी का बेवाण लिए चल रहे थे। बग्गीयो में तपस्वियों को विराजित किया गया था। महिलाएं पीले परिधानों मेंअमृत कलश सिरोधार्य किए चल रही थी। शोभा यात्रा दिगंबर जैन मांगलिक भवन से प्रारंभ हुई जो नगर के घंटाघर पटेल चाल, कमल चौक, दाना गली, तिलक मार्ग, जाजू बिल्डिंग होते हुए दिगंबर जैन मंदिर पर पहुंचकर धार्मिक अनुष्ठानों में परिवर्तित हो गई।
दिगंबर जैन मांगलिक भवन में आयोजित आयोजित सम्मान समारोह में उपस्थित जन समूह को संबोधित करते हुए मुनी सुप्रभा सागर जी महाराज ने कहा कि हमसे गलती हो तो क्षमा अवश्य मांगना चाहिए। जिसे शत्रुता हो उनसे अवश्य क्षमा मांगना चाहिए ।क्षमा मांगने वाले का क्रोध समाप्त हो जाता है और जीवन सुरक्षित हो जाता है। वह आगे बढ़ता नहीं है। क्षमा में कोई शर्त नहीं होनी चाहिए। क्षमा मांग कर मन शुद्ध हो जाता है तो वहां परमात्मा बसते है। वैराग्यसागर जी महाराज ने कहा कि आत्मा का स्वभाव शांति में रहना होता है ।क्षमा मांगने से शांति मिलती है। क्षमा के बिना संसार में सब बेकार है। इस अवसर पर 10 उपवास की तपस्या करने वालों में आभा विनायका, सुशील अजमेरा, सीमा अजमेरा, दीपा काला, अंजलि सेठी सहित अनेक तपस्वी सहभागी बने। परम पूज्य चारित्र चक्रवर्ती 108 शांति सागर जी महामुनि राज के पदारोहण के शताब्दी वर्ष मे परम पूज्य मुनि 108 श्री वैराग्य सागर जी महाराज एवं परम पूज्य मुनि 108 श्री सुप्रभ सागर जी महाराज जी का पावन सानिध्य मिला।