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November 4, 2024, 11:43 am
KHABAR : परंपरा - शहर कोट राजा को विलुप्त होती बेलों की जोड़ी ने कराया भ्रमण, महामारी वर्षा की खेंच प्राकृतिक आपदा के राजा हैं घास भैरव, पटाखों की धड़ाधड़, उठता धुंआ, उड़ती धूल के बिच लोगों की मस्ती, पढ़े दिनेश वीरवाल की खबर 

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सरवानियां महाराज। शहर कोट राजा श्री घास भैरव दिपावली पर्व की गोवर्धन पूजा के बाद  दुसरे दिन रविवार को पंरपरागत रुप से शहर भ्रमण पर निकले। दिपोत्सव की चकाचौंध में उड़ती हुई धुल पटाखों की धड़ाधड़ करती आवाज़ और पटाखों के फुटने से उठते हुवे धुवें ने रविवार को शहर की रंगत को रंगीन और खुशनुमा बना दिया। आम रोगों से अलग भौतिक प्रकृति से भिन्न रोग और आसमानी सुल्तानी से होने वाली बिमारियों और प्राकृतिक प्रकोप की छाया शहर पर ना पड़े, इसलिए घास भैरव को बेलों की जौड़ी (हामद) द्वारा शहर में भ्रमण कराया जाता है ताकि शहर का बच्चा-बच्चा हंसी खुशी के साथ जीवन यापन कर सके।

प्राचीन परंपरा का गवाह बना शहर-
परंपरा के अनुसार गोवर्धन पूजा के दुसरे दिन घास भैरव स्थल पर सुबह से ही लोगों की भीड़ लग जाती है। ढोल ढमाके के साथ घास भैरव को स्नान आदि कराकर सिंदूर का चोला चढ़ाकर , मदीरा का भोग लगाकर शहर कोट राजा को विमान पर बिठाया जाता है उसके बाद बेलों से खिंचा जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में उपस्थित शहरवासियो द्वारा फटाखे छोड़ घास भैरव के जय घोष लगायें जाते हैं।

प्रकृति की मार सुखा वर्षा की खेंच और महामारी सब कुछ से रक्षा-
गांव की बसाहट के समय से ही घास भैरव का अलग दर्जा और अलग ही स्थान है उन्हे यंहा राजा के समान माना ही नहीं बल्कि पूजा भी जाता है। परंपरा के अनुसार गोवर्धन पूजा के दुसरे दिन घास भैरव को बेलों द्वारा नगर में भ्रमण कराया जाता है ताकि शहर में किसी भी प्रकार कि बिमारी नहीं फैले। कभी कभी वर्षा की खेंच की स्थिति में भी भ्रमच का आयोजन किया जाता है। शहरवासियों की जान माल के साथ साथ मवेशियों की रक्षा करना तथा आफत काल जैसे अकाल सुखा वर्षा की खेंच में भी देवी देवताओं के कहने पर घास भैरव को भ्रमण कराया जाता है। चारभुजानाथ मंदिर वाली गली के उत्तरी छोर पर स्थित घास भैरव स्थल से भ्रमण की शुरुआत होती है जो सदर बाजार , होली थड़ा, सुथार मोहल्ला, जावी चौराहा, नीमच सिंगोली मुख्य मार्ग, हरिया भैरव चोक, शिव मंदिर, गढ़ पिछे होकर पुनः अपने धाम पर समापन होता हैं। इस दौरान अलग अलग स्थानों पर किसानों द्वारा विलुप्त होती बेलों की जौड़ी से उन्हें खिंचा जाता है। भले ही जमाना आधुनिकता की राह पर है और कृषि में बेलों की उपयोगिता का स्थान ट्रेक्टर और अन्य साधनों ने ले लिया है लेकिन शहर के घास भैरव के मामले में आज भी बेलों की जौड़ी प्रासंगिक है।

मदिरा का भोग सिंदूर का चोला इत्र की महक-
घास भैरव को भक्त भक्ति भाव से सिंदुर का चोला चढ़ाकर नारियल का प्रसाद चढ़ाकर महकदार इत्र अगरबत्ती लगाकर  मदीरा का भोग लगाकर शहर में खुशहाली की कामना करते हैं। फसलों को कीट पतंगों प्राकृतिक आपदाओं से बचाव तथा मनुष्यों में किसी भी प्रकार का रोग नहीं फेलने को लेकर तथा गो वंश मवेशियों पशु पक्षियों जानवरों में महामारी ना फैले इस को लेकर भी घास भैरव को शहर भ्रमण कराया जाता है।

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