जावद। हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में पहला संस्कार "गर्भाधान संस्कार" है। इस विषय पर जावद में गायत्री परिवार के व्यवस्थापक कमल किशोर एरन की सुपुत्री अर्पिता अग्रवाल (चार्टर्ड अकाउंटेंट एवं गर्भाधान संस्कार कोच एंड ऑथर) की पत्रकार वार्ता संपन्न हुई। चूंकि विषय अछूता है इसलिए अजीत कांठेड़ एडवोकेट द्वारा भूमिका दर्शाते हुए बतलाया गया कि अग्रवाल इस माध्यम से समाज सेवा का कार्य कर रही हैं जो आज की आवश्यकता भी है।
अग्रवाल ने अपने संबोधन में कहा कि - हमारे ऋषि मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व गर्भाधान संस्कार पर विस्तार पूर्वक बतलाया क्योंकि हम पशु पक्षियों से भिन्न एक समाज में रहते हैं । उस समय धर्म,अधर्म पर गहन चिंतन के परिणाम स्वरुप देवताओं ने भी मनुष्य से सहायता मांगी थी । आज विपरीत स्थिति है जिसमें सुधार की आवश्यकता है जो गर्भाधान संस्कार से संभव है।
अग्रवाल ने गर्भ में चक्रव्यूह का ज्ञान पाने वाले अभिमन्यु ,बचपन से ईश्वर में परम आस्था रखने वाले भक्त प्रहलाद व शूरवीर संतान की इच्छा रखने वाली छत्रपति शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई के उल्लेख से विषय पर प्रकाश डाला और कहा कि - आज कृषि उत्पादों पर तो शोध हो रहा है पर गर्भाधान संस्कार को महत्व नहीं दिया जा रहा। अग्रवाल से प्रश्न किया गया कि - "मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, भागवत पुराण व महाभारत में गर्भाधान संस्कार पर सब कुछ कह दिया गया है तो आप क्या नया लेकर आई हैं ?" इस पर अग्रवाल ने उत्तर दिया कि - "हमारे पास नया कुछ भी नहीं है । हम तो ऋषि मुनियों के संदेशों का पुनर्जागरण कर रहे हैं ।"
अग्रवाल से पुनर्जन्म घटनाओं की सत्यता या असत्यता के बारे में पूछा गया तो उत्तर था - "पुनर्जन्म की घटनाएं सत्य हैं ।" इस संबंध में उन्होंने श्रीमद्भागवत गीता के 15 वें अध्याय के 7 वें श्लोक का संदर्भ दिया। अग्रवाल से किसी मृत आत्मा द्वारा पुनः उसी कुल में जन्म लेने के निश्चय करने एवं जन्म लेने के बाद उसका विवरण देने की घटनाओं का गर्भाधान संस्कार से संबंध के बारे में प्रश्न पूछा गया तो उत्तर था - "यह विषय पृथक है । अग्रवाल द्वारा स्वयं प्रयोग के पश्चात यूट्यूब पर गर्भ संवाद, गर्भ प्रार्थना एवं गर्भ धारण जैसी विधियां दर्शाई गई हैं । इनमें उल्लेख किया गया है कि गर्भावस्था में ईर्ष्या, चिंता, क्रोध, तनाव जैसे भावों को त्यागा जाए व सात्विक आचरण, शुद्ध आहार विहार व भगवत चिंतन को अपनाया जाए, जिसका संतान पर श्रेष्ठ प्रभाव हो । भावी पीढ़ियों में प्रेम, करुणा, भक्ति, साहस, परिश्रम, बलिदान जैसे गुणों की वृद्धि हो । भारत ही नहीं, विदेशों में भी इसका महत्व समझा जा रहा है।