चित्तौड़गढ़। ज्योतिषाचार्य पंडित विकास उपाध्याय, ॐ तत्सत् पारमार्थिक संस्था ने बताया कि सनातन संस्कृति में प्रत्येक पर्व केवल आनंद और उत्सव का अवसर नहीं होता, बल्कि वह जीवन को संतुलित करने और कर्तव्यों की याद दिलाने का माध्यम भी है। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पर्व है—पितृ पक्ष। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलने वाले 16 दिवस दिवंगत पितरों के स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए समर्पित माने जाते हैं। इस वर्ष यह पावन कालखंड 07 सितंबर 2025, रविवार से प्रारंभ होकर 21 सितंबर 2025, रविवार को समाप्त होगा।
पितृ पक्ष क्यों मनाया जाता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब आत्मा देह त्याग कर सूक्ष्म लोक में जाती है तो उसके वंशजों द्वारा किए गए श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण उसे शांति और संतोष प्रदान करते हैं। शास्त्रों में वर्णन है कि इस समय समस्त पितर अपने-अपने वंशजों की ओर निहारते हैं और उनसे मिलने वाली श्रद्धांजलि को स्वीकार करने के लिए पृथ्वी लोक के समीप विद्यमान रहते हैं।
पंडित विकास उपाध्याय बताते हैं कि “श्राद्ध पक्ष का वास्तविक उद्देश्य केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और उन्हें सम्मान देना है। यही कारण है कि इसे ‘श्राद्ध पक्ष’ कहा गया है—क्योंकि यह कार्य श्रद्धा से ही पूर्ण होता है।”
शास्त्रों में पितृ पक्ष का महत्व
गरुड़ पुराण में कहा गया है कि श्राद्ध से पितरों को संतोष प्राप्त होता है और वे वंशजों को आशीर्वाद देते हैं।
महाभारत में भी युधिष्ठिर ने भीम से कहा कि पितृ ऋण चुकाने का उत्तम साधन श्राद्ध ही है।
मनुस्मृति में पितरों को देवताओं से भी पहले स्थान दिया गया है और कहा गया है कि पितरों की कृपा के बिना देव कृपा प्राप्त नहीं होती।
श्राद्ध पक्ष की परंपराएँ और आचार
श्राद्ध पक्ष में केवल अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि जीवनशैली भी सात्विक रखने का निर्देश है। यह समय आत्मनियंत्रण, संयम और आध्यात्मिक साधना का है।
श्राद्ध के मुख्य कार्य
1. तर्पण: जल में तिल, कुशा, पुष्प और जल अर्पित कर पितरों को संतोष देना।
2. पिंडदान: जौ या चावल के पिंड बनाकर पितरों को अर्पण करना।
3. ब्राह्मण भोजन: ब्राह्मण को भोजन कराना पितरों को प्रसन्न करने का श्रेष्ठ माध्यम माना गया है।
4. दान: अन्न, वस्त्र, धान्य, गौ, भूमि अथवा दक्षिणा का दान करना शुभ होता है।
क्या करना चाहिए?
तीर्थ स्नान कर तर्पण करें।
श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करें, विशेषकर 15वाँ अध्याय।
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या पितृ स्तोत्र का जप करें।
कौवा, गाय, कुत्ता, चींटियों और अतिथि को भोजन दें।
सात्विक भोजन करें, घी और दूध से बने पकवान का प्रयोग करें।
इष्टदेव को भोग अर्पित कर फिर पितरों को भोग अर्पित करें।
क्या नहीं करना चाहिए?
मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज जैसे तामसिक पदार्थों का सेवन न करें।
लोहे के पात्रों का प्रयोग न करें।
विवाह और अन्य मांगलिक कार्य न करें।
क्रोध, झूठ और अपवित्र आचरण से बचें।
श्राद्ध का उचित समय (कुतप काल)
शास्त्रों में श्राद्ध कर्म दोपहर के समय करने का निर्देश है। इसे कुतप काल कहते हैं। यही समय पितरों को तर्पण और पिंडदान अर्पित करने के लिए सबसे उत्तम माना गया है।
पितृ पक्ष 2025 की तिथियाँ (सनातन पंचांग अनुसार)
पूर्णिमा श्राद्ध — रविवार 07 सितंबर 2025
प्रतिपदा श्राद्ध — सोमवार 08 सितंबर 2025
द्वितीया श्राद्ध — मंगलवार 09 सितंबर 2025
तृतीया एवं चतुर्थी श्राद्ध — बुधवार 10 सितंबर 2025
पंचमी श्राद्ध — गुरुवार 11 सितंबर 2025
षष्ठी श्राद्ध — शुक्रवार 12 सितंबर 2025
सप्तमी श्राद्ध — शनिवार 13 सितंबर 2025
अष्टमी श्राद्ध — रविवार 14 सितंबर 2025
नवमी श्राद्ध — सोमवार 15 सितंबर 2025
दशमी श्राद्ध — मंगलवार 16 सितंबर 2025
एकादशी श्राद्ध — बुधवार 17 सितंबर 2025
द्वादशी श्राद्ध — गुरुवार 18 सितंबर 2025
त्रयोदशी श्राद्ध — शुक्रवार 19 सितंबर 2025
चतुर्दशी श्राद्ध — शनिवार 20 सितंबर 2025
अमावस्या सर्वपितृ श्राद्ध — रविवार 21 सितंबर 2025
पितृ पक्ष और सामाजिक पहलू
पितृ पक्ष केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है। यह हमें सामाजिक जिम्मेदारी और पारिवारिक संस्कार की भी याद दिलाता है।
इस समय भोजन का दान, जरूरतमंदों की सहायता और ब्राह्मणों का सत्कार समाज में सहयोग और सद्भाव का संदेश देता है।
यह पर्व पीढ़ियों को जोड़ता है और यह स्मरण कराता है कि हमारी वर्तमान समृद्धि में हमारे पूर्वजों का योगदान है।
आधुनिक परिप्रेक्ष्य में पितृ पक्ष
आज के समय में जब परिवार छोटे होते जा रहे हैं और लोग पूर्वजों की परंपराओं से दूर हो रहे हैं, पितृ पक्ष हमें अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम है।
विदेशों में रहने वाले लोग भी इस अवसर पर तर्पण और स्मरण करते हैं।
कई परिवार अब ऑनलाइन पंडितों से मार्गदर्शन लेकर श्राद्ध करवाते हैं।
पर्यावरण की दृष्टि से भी श्राद्ध का महत्व है, क्योंकि इसमें पेड़-पौधों, पक्षियों और जीवों के लिए अन्न और जल अर्पित करने की परंपरा है।
07 सितंबर से 21 सितंबर 2025 तक चलने वाला पितृ पक्ष हमें केवल एक धार्मिक कर्मकांड की याद नहीं दिलाता, बल्कि यह हमारे जीवन की उस नींव का स्मरण कराता है जो हमारे पूर्वजों ने रखी।
ज्योतिषाचार्य पंडित विकास उपाध्याय कहते हैं कि “श्राद्ध पक्ष आत्मशुद्धि, संयम और कृतज्ञता का पर्व है। इस समय यदि हम श्रद्धा से अपने पितरों का स्मरण करें तो वे हमें हर प्रकार से आशीर्वाद प्रदान करते हैं और जीवन में सुख, शांति तथा समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करते हैं।”
अतः इस पितृ पक्ष में हम सभी को अपने पूर्वजों की याद कर श्रद्धापूर्वक श्राद्ध और तर्पण करना चाहिए। यही सनातन धर्म की परंपरा और संस्कृति की आत्मा है।