निंबाहेड़ा। नगर में विराजित राष्ट्रसंत दिगंबर जैन आचार्य मुनि पुलक सागर ने प्रवचनमाला के दूसरे दिन ‘पाप-पुण्य का संयोग रू मंदिर दर्शन से आत्मशुद्धि तक’ विषय पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते समय मन की सीढ़ियां भी चढ़नी चाहिए। मूरत की पूजा के साथ अपनी सूरत और चरित्र का भी निर्माण करें। पाप घटाएं, पुण्य बढ़ाएं और हर बार मंदिर से नई आत्मा लेकर घर लौटें।
उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन पाप और पुण्य के तराजू के समान है। पुण्य से प्राप्त साधनों का उपयोग यदि धर्म में किया जाए तो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है, जबकि उनका दुरुपयोग पाप का कारण बनता है। मंदिर केवल मनोकामनाएं मांगने का स्थान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, पुण्य संचय और आध्यात्मिक उन्नति का केंद्र है।
आचार्य श्री ने कहा कि संगमरमर का पत्थर अपने आप चमत्कारी नहीं होता, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और विधिपूर्वक किए गए धार्मिक अनुष्ठानों से वह परमात्मा का स्वरूप बनता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे मंदिर में इंद्र भाव से पूजा करें और भगवान से सांसारिक वस्तुएं नहीं, बल्कि उन्हें प्राप्त करने की पात्रता एवं सद्बुद्धि की प्रार्थना करें।
प्रवचन के दौरान मुनि श्री ने पंचकल्याणक का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार तीर्थंकरों के पंचकल्याणक मनाए जाते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक श्रद्धालु को मंदिर दर्शन के समय अपनी आत्मा के पंचकल्याणक का भाव करना चाहिए। मंदिर में प्रवेश करते समय सम्यक्त्व का भाव, भगवान के दर्शन से नए जीवन का संकल्प, अभिषेक के दौरान कषायों का त्याग, प्रवचन से ज्ञानार्जन तथा मंदिर से बाहर निकलते समय मोक्ष मार्ग पर चलने का संकल्प ही सच्ची आत्मशुद्धि है।
उन्होंने कहा कि मंदिर पुण्य बढ़ाने और पापों का क्षय करने का स्थान है। दर्शन, पूजन, स्वाध्याय, दान और सेवा से पुण्य बढ़ता है, जबकि आलोचना, निंदा, दिखावा और कलह जैसे व्यवहार पुण्य को नष्ट कर देते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे स्वयं को बदलने का प्रयास करें और मंदिर से लौटने के बाद भी अपने व्यवहार में धर्म, शांति और सद्भाव बनाए रखें।