नयागांव (निंबाहेड़ा)। राष्ट्रसंत मुनि श्री पुलक सागर ने कहा कि मंदिर केवल दर्शन का स्थान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मचिंतन का केंद्र है। मंदिर में प्रत्येक दर्शन ऐसे करें, जैसे अपनी आत्मा का पंचकल्याणक मना रहे हों और हर बार नई चेतना व पवित्र भाव लेकर घर लौटें।
नगर में आयोजित प्रवचनमाला के दूसरे दिन ष्पाप-पुण्य का संयोग रू मंदिर दर्शन से आत्मशुद्धि तकष् विषय पर प्रवचन देते हुए मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य को यह दुर्लभ मानव जीवन पुण्योदय से प्राप्त हुआ है। आज अधिकांश लोग मंदिर जाकर घंटा बजाते हैं, भगवान के दर्शन करते हैं और लौट आते हैं, लेकिन आत्मिक परिवर्तन नहीं कर पाते। मंदिर का उद्देश्य केवल दर्शन करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के पापों को कम करना और पुण्य का संचय करना है।
उन्होंने कहा कि जीवन एक तराजू की तरह है, जिसके एक पलड़े में पाप और दूसरे में पुण्य है। यदि पुण्य से प्राप्त साधनों का उपयोग पाप में किया जाए तो उसका परिणाम दुःखद होता है, जबकि धर्म और सद्कर्म में उनका उपयोग मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
मुनिश्री ने कहा कि संगमरमर की प्रतिमा अपने आप में चमत्कारी नहीं होती। धार्मिक विधि-विधान, श्रद्धा और पवित्र भाव से की गई आराधना ही उसे आराध्य बनाती है। इसलिए मंदिर में सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति मांगने के बजाय आत्मबल, सद्बुद्धि और धर्मपालन की शक्ति की कामना करनी चाहिए।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि मंदिर में इंद्र जैसी भावना से पूजा करें। जिस प्रकार इंद्र भगवान की सेवा को सौभाग्य मानते हैं, उसी प्रकार श्रद्धालुओं को भी भगवान के प्रति कृतज्ञता और समर्पण का भाव रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि जहां लेने की अपेक्षा सेवा और समर्पण का भाव होता है, वहीं सच्चा पुण्य अर्जित होता है।
मुनिश्री ने पंचकल्याणक का उल्लेख करते हुए कहा कि श्रद्धालु मंदिर प्रवेश के प्रत्येक चरण को आत्मिक विकास से जोड़ें। मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते समय सम्यक दर्शन का भाव, भगवान के दर्शन करते समय आत्मिक नवजन्म का संकल्प, अभिषेक के समय कषायों के त्याग का भाव, प्रवचन और स्वाध्याय के माध्यम से ज्ञान प्राप्ति तथा मंदिर से लौटते समय मोक्षमार्ग पर चलने का संकल्प लेना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भगवान के मंदिर पुण्य संचय और पापों के क्षय का केंद्र हैं। दर्शन, पूजन, स्वाध्याय, दान और सेवा से पुण्य बढ़ता है, जबकि आलोचना, निंदा, दिखावा और कलह जैसे व्यवहार पुण्य को नष्ट कर देते हैं। इसलिए पहले स्वयं को बदलने का प्रयास करें, तभी धर्म का वास्तविक लाभ प्राप्त होगा।