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February 28, 2024, 6:55 pm
NEWS : होलाष्टक पर इस बार मीनार्क और शुक्रास्त का त्रिवेणी संगम- डॉ मृत्युञ्जय तिवारी, तपस्या, तन्त्र और साधना के लिए सर्वोत्तम समय, होलाष्टक 2024 में इन कार्यों पर रोक, पढ़े रेखा खाबिया की खबर 

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चित्तौड़गढ़। होलिका दहन से ठीक आठ दिन पहले का समय होलाष्टक कहा जाता है। इसकी शुरुआत फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से हो जाती है और होलिका दहन होलाष्टक 2024 का आखिरी दिन से होती है। श्री कल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभागाध्यक्ष डॉ मृत्युञ्जय तिवारी के अनुसार हिंदू समुदाय में इन आठ दिनों को अशुभ माना जाता है और शादी, विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य पर रोक रहती है। इसके बाद रंगवाली होली के दिन से शुभ कार्य शुरू होते हैं। माना जाता है कि होलाष्टक के आठ दिन तपस्या के होते हैं। इस समय सदाचार और आध्यात्मिक कार्यों में जीवन बीताना चाहिए। यह समय ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से प्रायः फरवरी-मार्च महीनों के बीच पड़ता है।

17 मार्च से शुरू हो रहा होलाष्टक 2024-
पंचांग के अनुसार फाल्गुन शुक्ल अष्टमी की तिथि की शुरुआत 16 मार्च रात 9.39 बजे से हो रही है, जबकि यह तिथि रविवार 17 मार्च 9.53 बजे संपन्न हो रही है। इसलिए उदयातिथि में फाल्गुन शुक्ल अष्टमी 17 मार्च को होगी और इसी दिन से होलाष्टक की शुरुआत मानी जाएगी। जबकि आठवें दिन 24 मार्च को होलिका दहन होगा और यह दिन होलाष्टक का आखिरी दिन होगा। फिर अगले दिन 25 मार्च को होली (धुलेंडी) से शुभ कार्यों से रोक हट जाएगी। इसी तिथियों में शुक्रास्त होगा और देवगुरु मीन राशि में विराजमान रहेंगे।
होलाष्टक शब्द होली और अष्टक (8वां दिन) से मिलकर बना है। मान्यता है कि होलाष्टक के दौरान सभी ग्रह उग्र स्वभाव में होते हैं, इसलिए इस समय शुभ कार्यों के अच्छे परिणाम नहीं मिल पाते। इसी कारण इस समय विवाह, बच्चे का नामकरण संस्कार, गृह प्रवेश और किसी भी अन्य 16 हिंदू संस्कार या अनुष्ठान नहीं किए जाते हैं। कुछ समुदाय में लोग होलाष्टक काल के दौरान कोई नया व्यवसाय या उद्यम भी नहीं शुरू करते।

क्या करते हैं होलाष्टक में-
होलाष्टक हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश और उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों में उत्साह से मनाया जाता है। होलाष्टक की परंपरा के अनुसार इस दिन यानी फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी के दिन होलिका दहन के लिए स्थान का चयन किया जाता है। इसके बाद हर रोज होलिका दहन के स्थान पर छोटी-छोटी लकड़ियां एकत्र कर रखी जाती हैं। इसके अलावा पहले दिन से ही लोग किसी पेड़ की शाखा को रंग-बिरंगे कपड़ों से सजाना शुरू करते हैं। हर व्यक्ति इस शाखा पर कपड़े का एक टुकड़ा बांधता है और आखिरी दिन उसे जमीन में गाड़ देता है। कुछ समुदाय होलिका दहन के दौरान कपड़ों के इन टुकड़ों को भी जलाते हैं ।

होलाष्टक की तपस्या-
होलाष्टक तपस्या के दिन होते हैं। ये आठ दिन दान पुण्य के लिए विशेष होते हैं। इसलिए इस दौरान व्यक्ति को अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार कपड़े, अनाज, धन और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करना चाहिए। इससे विशेष पुण्य फल मिलता है। इसके अलावा इस समय आध्यात्मिक कार्यों में समय बिताना चाहिए और सदाचार, संयम, ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। तन्त्र साधना और सिद्धि के लिए यह समय श्रेष्ठ होता है।

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