नीमच। छः ढाला ग्रंथ से पाप कर्म और जीव तत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। जीव दया का पालन करने और जीवों की विराधना से बचने के लिए चातुर्मास के समय वर्षा कल होने से साधु संत विहार नहीं करते हैं। यदि इसका पालन मानव जीवन में मनुष्य भी कर तो वह भी पाप कर्म से बच सकता है और पाप कर्म से मिलने वाली सजा के रूप में दुःख जो आने वाले हैं उन दुरूखों से बच सकता है।छः ढाला ग्रंथ जीवन को समझने का माध्यम है।यह बात वैराग्य सागर जी महाराज साहब ने कही।वे पार्श्वनाथ दिगंबर जैन समाज नीमच द्वारा दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित धर्म सभा में बोल रहे थे ।उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में साधु संत चार माह तक एक ही स्थान पर योग लगाकर निश्चित होकर विराजित होते थे। वे कहीं आते-जाते नहीं थे ताकि जीव दया का पालन हो जाए और जीवों की विराधना नहीं हो। भूकंप आने से पहले ही जमीन में रहने वाले चीटियां को संकेत मिल जाता है। संसार में दुःख ज्यादा है सुख कम है। संसार भ्रमण को यदि हम छोड़ना चाहते हैं तो हमें अपने स्वयं की आत्मा का अध्ययन करना होगा।
मुनि सुप्रभ सागर जी मसा ने कहा कि यदि मनुष्य ने नीच कूल में जन्म लेता है और उसमें सद्गुण है तो उसका कल्याण हो सकता है लेकिन यदि मनुष्य उच्च कुल में जन्म लेकर भी उनके विचारों में उच्चता नहीं है या पंच परमेष्ठी के प्रति उनकी आत्मा की श्रद्धा नहीं है। विवेक नहीं है तो उच्च कूल में जन्म लेने के बाद भी वह व्यक्ति अपना कल्याण नहीं कर सकता है। मनुष्य को यदि जीवन में कल्याण करना है तो कपड़े धोने और जूते का व्यवसाय नहीं करना चाहिए। एसे हल्के कर्म नहीं करना चाहिए। ताकि जीवन में कभी दुःख नहीं आए। अष्ट्र द्रव्यों से पूजन से पूर्व अभिषेक करने से असंख्य के कर्मों की निर्जरा होती है। छोटे व्रत भी आत्म कल्याण का कारण बनते हैं।परम पूज्य चारित्र चक्रवर्ती 108 शांति सागर जी महामुनि राज के पदारोहण के शताब्दी वर्ष मे परम पूज्य मुनि 108 श्री वैराग्य सागर जी महाराज एवं परम पूज्य मुनि 108 श्री सुप्रभ सागर जी महाराज जी का पावन सानिध्य मिला। उक्त जानकारी दिगम्बर जैन समाज एवं चातुर्मास समिति के अध्यक्ष विजय विनायका जैन ब्रोकर्स, मिडिया प्रभारी अमन विनायका ने दी।