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November 9, 2024, 11:09 am
BIG NEWS : दिलचस्प- एक उनसाठ साल के व्यक्ति के लिए गुजर बसर का जरिया बनी पचपन साल पहले बनी हिन्दी फ़िल्म मेरा नाम जोकर, खुद के दुःख कि कीमत पर रमेश लोगों को हंसाने करते हैं मीलों सफर, पढ़े दिनेश वीरवाल की खबर 

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सरवानियां महाराज। यह बात बहुत दिलचस्प है कि आज से लगभग पचपन साल पहले बनी हिन्दी फ़िल्म मेरा नाम जोकर किसी के जीवन में गुजर बसर का मुख्य मोरल बन गई हो। 
खुद के दुःख कि कीमत पर लोगों को हंसाने के किरदार को लोग अक्सर जोकर कहते हैं। उनसाठ साल कि उम्र और दिन भर की थकान के बीच तीन सो चार सो रुपए यही रोजमर्रा का जीवन है रमेशचंद्र ब्रम्ह भट का । यह अजीब इत्तेफाक है कि फिल्म के हिरो राजकपूर के आंशिक जीवन पर आधारित इस फिल्म की कहानी रमेशचंद्र ब्रम्ह भट के जीवन को आंशिक रूप से मेच करती है फर्क सिर्फ इतना है कि राजकपूर के जीवन में यह पहले घटी घटना थी और रमेश के जीवन में बाद में घटने वाली। 

जोकर की वेषभूषा और परिवार पालने की चिंता रमेशचंद्र को उम्र के इस पड़ाव पर भी लगातार चलतें रहने को मजबुर किये हुए हैं। हमारे प्रतिनिधि दिनेश वीरवाल को रमेश चंद्र ब्रम्ह भट ने  बताया कि घर में मेरे अलावा मेरी धर्मपत्नी भी है बच्चे भी हैं। लेकिन मैं और मेरी धर्मपत्नी साथ साथ रहते हैं बच्चे अपना अपना दुसरा काम करते हैं। मे आज भी पुस्तेनी काम कर अपना गुजर-बसर कर रहा हूं। परिवार को पालने के लिए नीमच निवासी रमेश चंद्र ब्रम्ह भट जोकर का परिधान पहनकर नीमच से मीलों दुर दुर तक लोगों के बीच मनोरंजन करने पहुंच जाते हैं और खुद के दुःख को दबाकर उसकी किमत पर लोगों का मनोरंजन करते हैं। श्री ब्रम्ह भट ने बताया कि शासन की हितग्राही मूलक योजनाएं मुझ गरीब के घर तक नहीं पहुंच पाई है। वृद्धावस्था पेंशन में एक वर्ष की कमी बताते हैं तो निराश्रित पेंशन योजना का लाभ भी नहीं मिला है। 

फिल्म मेरा नाम जोकर का सेट-
साल 1970 में बनी हिन्दी फ़िल्म मेरा नाम जोकर के सेट से जोकर वाले परिधान को चुनकर पुस्तेनी काम कर रहे रमेश चंद्र अपने परिवार की आखरी पीढ़ी है जो इस काम को कर रही है। फिल्म मेरा नाम जोकर आंशिक रूप से राजकपूर के जीवन पर आधारित होकर लगभग छः ह साल कि लंबी अवधि के बाद रिलीज हुई थी। इस फिल्म का सर्कस के दौरान सुट किया गया यह गाना ष् जाने कहां गए वो दिनष् तगड़ा फेमस हुआ था। उस गाने के बोल जाने कहां गए वो दिन भले ही पिछले समय की याद दिलाते तो हैं लेकिन रमेश के जीवन में यह बोल आज भी प्रासंगिक हैं।

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