चित्तौड़गढ़। आज के आपाधापी और प्रतिस्पर्धा के समय में आनंदित और सुखी रहने का एक ही तरीका है तृष्ना को कम करें, जब तक निहित स्वार्थ की इच्छाएं और आशाएं बढ़ती रहेगी तब तक अशांति व संकलेश बना रहेगा। अहिंसा, शाकाहार और सदाचार जीवन में शांति लाने का अच्छा तरीका है, इसे अपनाया जाए तो यह विश्व शांति का मूल मंत्र बन सकता है।
यह उद्गार प्राकृत ज्ञान केसरी, प्राकृत मार्तण्ड, राष्ट्र संत आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज ने शम्भूपूरा अल्प प्रवास में विशेष भेंट वार्ता के दौरान व्यक्त किये। आचार्य श्री चित्तौड़गढ़ में नव निर्मित श्री आदिनाथ जिनालय के भव्यतम श्रीमद् आदिनाथ जिनबिम्ब पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव एवं विश्व शांति महायज्ञ आयोजन के पश्चात यहां से ससंघ मंगल विहार कर निम्बाहेड़ा होकर प्रतापगढ़ की ओर विहार करेंगे।
आचार्य सुनील सागर जी ने कहा कि जितनी ज्यादा काम इच्छाएं बढ़ती है, उतनी ही ज्यादा भाग दौड़ बढ़ती है, उतना ही ज्यादा लोभ बढ़ता है, और उससे अशांति के अलावा कुछ नहीं मिलता। मन को वश में करने से शांति को प्राप्त किया जा सकता है।
आचार्य सुनील सागर जी ने कहा कि जीवन में स्वार्थ और पैसे से ज्यादा कीमती है ज्ञान और आत्मा का कल्याण। साधन मिल जायेंगे, पद प्रतिष्ठा मिल जायेगी तो सुखी हो जाओंगे। लेकिन जब वैराग्य की ठोकर लगती है तो पता चलता है कि सुख तो हमारे अपने भीतर ही है। हम पहचान ही नही पा रहे है कि सुख का स्त्रोत कहा है। हिंसा और आतंक करने वाले तो बहुत दुखी रहते है। इसलिए धर्म अपने भीतर ही है।
वर्तमान समय की महति आवश्यकता-
संयुक्त परिवार ,संस्कृति और संस्कार आधुनिकता और अर्थ की दौड़ में युवा पीढ़ी के भ्रमित होने के सवाल पर आचार्य श्री ने कहा कि सभ्यता व संस्कार धर्म , समाज और व्यवहारिक जीवन में डिजिटल लाइफ और मोबाइल को ही सब कुछ समझा जा रहा है। लेकिन संस्कारों से जुड़े रहना जरूरी है, संस्कृति और संस्कारों के अनुरूप चलने से ही जीवन की सफलता है। संयुक्त परिवार वर्तमान समय की महति आवश्यकता है। क्योंकि उसमें माता-पिता और पूरा परिवार होता है, एक दूसरे का साथ, सुख दुख का बटवारा होता है, सहयोग मिलता है। उन्होंने कहा कि सम्मान और विनम्रता जीवन को ऊंचाइयों तक ले जाती है।
मुनि ने कहा कि अच्छी सोच एवं अच्छी सोच का सम्मान करने वालों की आज भी कोई कमी नही है। आप समाज में रूचि लेते है, धर्म ध्यान करते है तो कही ना कही आपको अधिकार भी मिलते है। सामाजिक क्षेत्र में आगे बढ़े, आम जनता में जाइये, सामाजिक संस्थाओं से जुड़ों लेकिन संस्कारों की पूंजी अगर आपके पास नही है तो आप एक समय के बाद धूल मे मिल जाओंगे।
धर्म और जातिगत भेदभाव व बंटवारे की राजनीति देश और समाज के लिए घातक-
आचार्य सुनील सागर जी ने धर्म और जातिगत भेदभाव व बंटवारे को घातक बताते हुए कहा कि वोटो की राजनीति के चक्कर में आज भाई-भाई का दुश्मन बन रहा है। कोई धर्म के नाम पर बंटवारे कर रहे हैं, तो कोई जातिगत गणना करवा कर उठा पटक कर रहे हैं , और कोई आरक्षण के नाम पर मर मिट रहे हैं, इस प्रकार विखंडन की नीति, बांटो और राज करो जैसी राजनीति के खेल देश और समाज के लिए खतरनाक है।
आचार्य श्री ने आव्हान किया कि इंसान इंसान को समझें ,आपस में एक दूसरे का सम्मान करें , एक दूसरे के धर्म का सम्मान करें, ईमान का सम्मान करें और आपस में मिलजुल कर रहे। उन्होंने कहा कितने राज और राजा बने और चले गए। ष् ना कोई राजा रहा ना कोई राज रहा, अगर कोई रहा तो सिर्फ एक अच्छे इंसान का काज रहा ।
महादेवत्व के लिए वितरागता ही चाहिए-
मुनि श्री ने कहा कि उचित समय की मर्यादाएं पूरी करो। किसी का तिरस्कार नही करना चाहिए। कई बार मनुष्य को शर्मिन्दा होने के भी मौके नही मिलते है। सच्चे धर्म का पालन करने से हमेशा के लिए बेड़ा पार हो सकता है। मान टूटे तो भगवान बने, मोह टूटा तो मोक्ष हुआ। मरते सब है लेकिन मोक्ष विरलों का ही होता है। असल में तो वितरागताओं के बल पर ही भगवान हो जाया जाता है। महादेवत्व के लिए वितरागता ही चाहिए।
उल्लेखनीय है कि राष्ट्र संत आचार्य सुनील सागर जी के सानिध्य में वर्ष 2025 में पांच पंच कल्याणक होंगे, आगामी जनवरी माह में गुजरात के दाहोद में पंचकल्याणक के लिए आचार्य श्री का सत्संग प्रतापगढ़ से गुजरात की ओर विहार होगा।