चित्तौड़गढ़। शास्त्रीनगर स्थित समता भवन में धर्मसभा को संबोधित करते हुए शासन दीपक आदित्य मुनि म.सा. ने कहा कि समकित के आठ बोल हैं। आठ बोलों को समझना चाहिए। निशंक दशा अर्थात प्रभु तीर्थंकर के बताए मार्ग पर शंका नहीं करना। गीता में कहा गया है कि शंकाशील आत्माएं विनाश को प्राप्त होती है। शंका के स्थान का त्याग करना चाहिए। निशंकाशित का अर्थ है परदर्शन की आकांक्षा करना, उत्साहित होना, अनुमोदन करना या प्रभावित होना। कवि आनंद जी कहते हैं कि प्रभु में आपकी भक्ति रंग से गाता हूं, अहोभाव से गाता हूं। उस प्रीति में कोई भंग ना पड़े। आध्यामिक साधना, भक्ति में व्यवधान न हो।
जब सासांरिक रिश्तों में रूकावट आ जाना या नई पीढ़ी के लोग कहते हैं कि ब्रेक अप हो गया, ऐसी स्थिति भी अशांति उत्पन्न करती है। ताका झांकी डॉट कॉम वाला काम नहीं होना, घर में रहना। इधर उधर ध्यान क्यों देना। परिणाम सभी के सामने आते हैं। डिजीटल अरेस्ट का शब्द आया है, अच्छे अच्छे लोग गिरफ्त में आ रहे हैं। फेक विडियोज बन रहे हैं। इस प्रकार संसार में भी बाधाएं आ जाती है। आध्यात्मिक साधना शुद्ध रहें, निशंकित होना होगा।
निर्विचिकन्य अर्थात फल के बारे में शंकित होना। सोचते हैं कि धर्म कार्य कर रहे हैं फल मिलेगा कि नहीं। तप, रात्रि भोजन त्याग, चौविहार सब नियम पालन कर रहे हैं और सोचते हैं कि फल मिलेगा या नहीं। ऐसा सोचना ही गलत है। कभी भी करनी के फल में संदेह नहीं होना चाहिये। सांसारिक कार्य जैसे व्यापारिक कार्य रोज करना, इसमें कभी नफा कभी नुकसान होता है। लेकिन नियमितता से व्यापार करते करते मुनाफा हो जाता है। यह एक उदाहरण है। ठीक इसी तरह अध्यात्म में भी निरंतरता एवं बिना फल की ईच्छा के साधना महत्वपूर्ण है। जैसे परिवार के साथ रहते हुए सभी कार्य करते हैं, संघ के कार्य भी वैसे ही पूर्ण करने चाहिए। बिना नाम व यश के कार्य में लगे रहना है। नो नेम नो ब्लेम के सिद्धान्त पर सेवा करें चाहे परिवार में चाहे समाज में तो निश्चित ही वो सराहनीय मानी जाएगी। सफलता ही मिलेगी। स्वार्थ रहेगा नहीं। मान अपमान की परवाह नहीं रहेगी? बस सेवा निष्काम होनी चाहिए। कर्तव्य से कार्य करते जाना है। निर्विचिकित्सा अर्थात कोई आकांक्षा ही नहीं है। सेवा किया और पुण्य का अर्जन हुआ। अशुभ कर्म को टाला। अमूढ़ दृष्टि अर्थात थोड़ा सा कार्य किया और रूक गया या कार्य ही बदल दिया। बार बार कार्य या व्यापार बदलेंगे तो सफलता नहीं मिल पाएगी। निरन्तरता नियमितता जरूरी है। उदाहरण दिया कि माला कितने समय तक नियमित होती है। ‘चली तो चांद तक नही तो शाम तक’ ऐसे में माला सफलता नहीं दिलाएगी।
मोक्ष सभी चाहते हैं। जन्म मरण से मुक्ति सभी चाहते हैं लेकिन पुरुषार्थ पूरा नहीं करते तो कैसे सफल होंगे। 58 या 59 साल की दीक्षा पर्याय वाले साधु साध्वी जी भी हैं, निरन्तर निष्काम साधना में रत हैं। प्रेरणा लेनी होगी, जीवन का लक्ष्य समझना होगा।
वात्सल्य - जब वात्सल्य से व्यवहार होता है तो प्रगति दिखती है। सुख शान्ति का वातावरण बनता है। छोटों के प्रति वात्सल्य का भाव रखने वाले महा पुरुषों के अनेक उदाहरण हैं। छोटों को मात्र वात्सल्य भाव से ऊंचा बना दिया। प्रगति प्रत्येक क्षेत्र में होती है चाहे वह संसार का कार्य या आध्यात्मिकता का। जब वात्सल्यपूर्ण व्यवहार होता है। आदर भाव दें, सहयोग करें। भजन की लाईने ‘‘मेवाड़ी सांवरियो नाना गुरू प्यारों लागे, प्यारो लागे मोहन मारो लागे’’ के माध्यम से बताया कि आचार्य श्री नानेश ने अपने जीवन में वात्सल्य भाव को प्राथमिकता पर रखा और लोकप्रिय लोकसंत बन गये। अनेकों का उत्थान किया। आध्यात्म के शिखर पर पहुंचाया। प्रामाणिक जीवन था। स्थिरिकरण, उपग्रहण का अर्थ समझना है। उपग्रहण का अर्थ है जैसे बीज अंकुरित हो गया अब उसकी सार संभाल की जरूरत है, उसका बचाव जरूरी है। इस प्रकार वात्सल्य व उपग्रहण का प्रभाव ही स्थिरिकरण कहलाता है।
जो भी सेवा कार्य करें उनका उत्साह बढ़ाना चाहिए। प्रभावना में वस्तु वितरण का उतना महत्व नहीं है। प्रभावना अर्थात धर्म प्रभावना, धर्म में सहयोग करना। संघ में सहयोग करना। साधु साध्वी की संयम यात्रा में सहयोगी बनें। उनकी साधना की भावना उच्चतर बनें। ऐसा सहयोग, प्रभावना उन्नतिकारक होती है। धर्म से सेवा से विचलित नहीं हो, प्राप्ति होती रहे ऐसा सहयोग प्रभावना कहलाती है। वात्सल्य उपग्रहण को समझें। वात्सल्य भाव की वृद्धि करें। पारसनाथ भगवान की वात्सल्यता से काला नाग बच गया। उसका उद्धार भी हो गया। समकित के 8 बोलों को समझें आचरण में लाएं, जीवन धन्य होगा।
प्रवचन सभा में पूर्व में अटल मुनि म.सा. ने श्रद्धा भक्ति का महत्व बताया। हिमांशु मुनि. ने कहा कि व्यवहारिक जीवन में क्या करना था और क्या कर रहे हैं। देखा देखी में समय जा रहा है। जिनशासन देव गुरू धर्म के प्रति श्रद्धा है यह अच्छी बात है लेकिन जीवन के कार्यों में भी यतना जरूरी है। अठारह पापों से बचना होगा। पापों से बचेंगे तभी साधना हो पाएगी। एक छोटा सा रोग भी असावधानी से जीवन नष्ट कर देता है। लेकिन पापों से भी भव भव बिगड़ जाते हैं। पापों से बचे सजगता रखें। पांच महाव्रतों का पालन करें। ऐसे गुरूओं की भक्ति करना कल्याणकारक है। धर्म के नाम पर हिंसा नहीं होना चाहिए। मिथ्यादर्शन शल्य का मतलब व परिणाम समझाया। अनंत जन्मों तक रूलाने वाला कार्य न करें। गलत समझ का कांटा दिमाग से निकालें परमानन्द प्राप्त करें।
धर्मसभा को शासनदीपक महासती प्रेमलताम.सा. ने संबोधित करते हुए कहा कि आदित्य मुनि म.सा. के त्याग की किरणें चमचमा रही है। प्रवचन श्रृंखला चल रही है, उनके बीच बोलना है आदेश हुआ है इसलिए धर्मसभा में निवेदन करती हूं कि समकित के बोल का प्रथम बोल परमार्थ का परिचय करें। परम शब्द इसलिए लगा कि अर्थ का व्यर्थ और स्वार्थ का परिचय तो बहुत हो गया, अब परमार्थ का परिचय जरूरी है। भजन ‘‘तन है यहां मन है वहां सिद्ध प्रभु का वास है जहां’’ के माध्यम से धर्म प्रेरणा की। महापुरुषों के अधिकतम सानिध्य का लाभ लेने का आह्वान किया। धर्मसभा में महासती प्रेमलता , महासती पुष्पलता , निरंजनाश्री , जिनप्रभा , सिद्धप्रभा , सुशीला कंवर , विरलाश्री ,राजीमती , तरूलता , अंजलीश्री वैभवप्रभा , पूरणाश्री , भव्याश्री , विराजित थे। धर्मसभा में उदित मुनि तथा जयप्रभ भी विराजित थे। धर्मसभा का संचालन संघ अध्यक्ष रोशनलाल लोढ़ा ने किया। विभिन्न प्रत्याख्यान हुए। आतिथ्य सत्कार का लाभ कुन्दनमल जैन ने लिया। प्रभावना वितरण का लाभ अब्बानी परिवार ने लिया।