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December 14, 2024, 11:30 am
BIG NEWS : कल से खरमास, एक महीने तक नहीं होंगे शुभ कार्य, अब धनु राशि में प्रवेश करेंगे सूर्य, तीर्थ यात्रा-स्नान और इष्ट की आराधना से होगा धर्म लाभ, पढे़ खबर 

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उज्जैन। पंचांग की गणना के मुताबिक 15 दिसंबर से 13 जनवरी तक खरमास रहेगा। सूर्य की धनु संक्रांति आरंभ होगी। यानि सूर्य का धनु राशि में प्रवेश करना। सूर्य का धनु राशि में परिभ्रमण एक माह रहता है। इसी एक माह में खरमास या मलमास की संज्ञा आती है। इस दौरान एक महीने विवाह और दूसरे शुभ कार्य नही होगें। इसके बाद 16 जनवरी से विवाह कार्यों की शुरुआत होगी।


ज्योतिषाचार्य पं. अमर डब्बावाला ने बताया कि, साल में दो बार सूर्य मलमास या खरमास की श्रेणी में आते है। जिसमें धनु व मीन राशि मानी जाती है। धनु और मीन राशि के स्वामी बृहस्पति है। पौराणिक गणना के अनुसार ग्रह सिद्धांतों में या ग्रहों के परिभ्रमण में किस ग्रह के किस राशि में गोचर करने से कौन से त्योहार, पर्व, कुंभ, अर्ध कुंभ या लघु कुंभ की स्थिति बनती है।


इस दृष्टि से धनु मास की संक्रांति धर्म की वृद्धि करने के लिए बताई जाती है। इस दौरान तीर्थाटन या तीर्थ स्नान एवं अपने इष्ट के निमित्त विशिष्ट साधना करना चाहिए। यह करने से वर्ष पर्यंत आध्यात्मिक उपलब्धि होती है।


सूर्य का धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करने पर मकर संक्रांति होगी। मकर में सूर्य के प्रवेश करते ही सूर्य का उत्तरायण माना जाता है। सूर्य के उत्तरायण से ही विवाह कार्य की पुनरू शुरुआत हो जाती है।


6 माह का उत्तरायण काल अलग-अलग प्रकार के धार्मिक मांगलिक कार्यों के लिए विशेष माना जाता है। इस समय में धर्म तथा पुण्य से जुड़े विशिष्ट कार्य किए जाते हैं। एक महीने बाद 16 जनवरी से पुनरू विवाह की शुरुआत हो जाएगी।


जनवरी से मार्च तक विवाह के 12 विशेष मुहूर्त
साल 2025 में जनवरी से मार्च तक तीन महीने के दौरान विवाह के 12 विशेष मुहूर्त रहेंगे। इसमें जनवरी माह में चार मुहूर्त, फरवरी माह में छह मुहूर्त और मार्च महीने में दो मुहूर्त रहेंगे।


इसके बाद 14 मार्च से मीन संक्रांति आरंभ होगी। यह भी मलमास की श्रेणी में आता है। 14 मार्च से 14 अप्रैल तक शुभ कार्य नही होंगे। इसके बाद पुनःरू मांगलिक कार्य की शुरुआत होगी।पं. डब्बावाला ने बताया कि सूर्य की धनु संक्रांति आरंभ होते से ही विवाह, यज्ञोपवीत, गृह प्रवेश, प्राण प्रतिष्ठा आदि कार्य वर्जित माने जाते हैं। इस दौरान तीर्थ यात्रा, तीर्थ पर पूजन या कल्पवास की स्थिति को तय करना चाहिए। सामान्य ग्रहस्थ के लिए 7 दिन से लेकर के 42 दिन तक का कल्पवास होता है। इस दौरान सत्संग, कथा श्रवण, भगवत, भजन, दान आदि करने चाहिए।

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