जमुनिया कला। राष्ट्र-संत महोपाध्याय श्री ललितप्रभ सागर जी महाराज ने कहा कि जीवन में जितनी जरूरत शिक्षा की है, उतनी ही जरूरत संस्कारों की है। शिक्षा न मिली तो खुद को नुकसान उठाना पड़ेगा, पर संस्कार न मिले तो सारे कुटुम्ब को नुकसान झेलना पड़ेगा। जो इंसान अपने जीवन में संस्कारों की माला धारण कर लेता है, उसे फिर हाथ में माला पकडने की जरूरत नहीं होती। सहयोग करने वाले हाथ उतने ही धन्य होते हैं जितने प्रार्थना करने वाले होंठ। उन्होंने कहा कि जीवन में सुबह-सुबह योग करें दिन में दूसरों का सहयोग करें। आखिर दूसरों को सहयोग देकर ही हम उन्हें अपने लिए सहयोगी बना सकते हैं। हमें याद रखना चाहिए - परहित सरिस धरम नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई। हम घर में एक-दूसरे के काम में हिस्सा बँटाएँ, दूसरों को पढने के लिए किताब-कॉपी दें, बुजुर्ग, अपाहिज, नेत्रहीन को रास्ता पार करने में मदद करें, घायल को अस्पताल पहुँचाएँ, भूखे को रोटी और तन ढकने को कपड़े दें। उन्होंने कहा कि आगे बढ़ने के लिए रोज भरपूर श्रम करें। भाग्य का दरवाजा खोलने का एक ही रास्ता है - श्रम। आखिर हमारे सपने किसी जादू के जरिए सच नहीं होते, उन्हें पूरा करने के लिए दृढ़ संकल्प और कठोर परिश्रम को ही हमें अपनी ताकत बनानी होती है। सफलता का मंत्र हैरू श्रममेव जयते। हम हर रोज 8 घंटे दिल से मेहनत करें, आपके 24 घंटे सुखमय होने की गारंटी है।
राष्ट्र-संत धर्मरत्न पारसनाथ जैन देरासर द्वारा विवेकानंद विद्यालय में विद्यार्थियों को शिक्षा और संस्कार पर आयोजित प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि स्वच्छता का पूरा ध्यान रखें। स्वच्छता स्वर्ग को साकार करने की पहली सीढ़ी है। सफाई कर्मचारी तो आजीविका जुटाने के लिए सफाई करते हैं, पर हम इसे स्वस्थ जीवन और सुन्दर पर्यावरण के लिए अपनाएँ। हमारी प्रतिज्ञा हो- हमन गंदगी करेंगे, न करने देंगे। हम हर रोज स्नान करें, धुले वस्त्र पहनें, पालतू जानवरों को स्वच्छ रखें, पड़े लगाएँ, घर, तालाब, नदी, स्कूल, ऑफिस स्वच्छ रखें। उन्होंने कहा कि जीवन में सम्मान का संस्कार लाएं। अपना सम्मान सभी चाहते हैं, पर यह हमें तभी मिलेगा,जब हम अपनी ओर से दूसरों को सम्मान देंगे। जिस समय हम किसी दूसरे का अपमान कर रहे होते हैं, हकीकत में उस समय हम अपना ही सम्मान खो रहे होते हैं। हमारा संकल्प हो - सबसे प्यार, सबका सम्मान। हम अपने से बड़ों के साथ ‘विनम्रता’ से पेश आएँ, अपनी पत्नी को भी ‘इज्जत’ दें, छोटों को भी ‘आप’ का संबोधन दें, काम करने वाली बाई के साथ भी ‘शालीनता’ से पेश आएँ।
उन्होंने कहा कि जीवन में सहनशीलता का संस्कार रखें । विपरीत परिस्थिति घटित होने पर धैर्य रखना ही सहनशीलता है। आपका 2 मिनट का धैर्य भी आने वाले 2 दिनों को दुखी होने से बचा सकता है। सहनशीलता का सूत्र है - बड़े डाँट दें तो सोचें- गलती होने पर बड़े नहीं डाँटेंगे तो कौन डाँटेगा। छोटों से गलती होने पर सोचें-बच्चों से गलती नहीं होगी तो किससे होगी। हम गाली का जवाब गाली से न दें, गुस्सा आने पर 10 मिनट मौन रहें, 10 लम्बी साँस लेकर अपने गुस्से को थूक दें।
उन्होंने कहा कि रोज मन लगाकर पढ़ाई करें। अच्छी किताबें पढ़ने से दिलो-दिमाग में ज्ञान के दीप जलते हैं और जीवन की विसंगतियों का दूर करने की ताकत मिलेती है। बिना स्वाध्याय के तो हमारा मन-मस्तिष्क आलतू-फालतू के विचारों में उलझा रहता है। याद रखें - एक अच्छी किताब, आगे बढने का चिराग। हम हर रोज आधे घंटा ही सही, खुद को मोटिवेट करने वाली अच्छी पुस्तकें पढने की आदत डालें।
उन्होंने कहा कि रोज प्रभु की प्रार्थना और साधना करें। साधनों का सुख भले ही दिनभर लीजिए, पर आधा घंटा ही सही, सुबह-शाम साधना का सुख भी लीजिए। जीवन में साधना को जोड़े रखेंगे, तो अंतरमन शांत, तनावमुक्त और सदाबहार आनंदमय रहेगा, नहीं तो मोह-माया में ज्यादा उलझ गए तो समझो भैंस गई पानी में। हर सुबह और रात को सोने से पहले शांति से ध्यान कीजिए और अपनी अंदरूनी ताकत को बढ़ाइए।
इससे पूर्व डॉ मुनि श्री शांति प्रिय सागर जी महाराज ने कहा कि हमारा पल भर का गुस्सा हमारा भविष्य बिगाड़ सकता है। क्रोध को अपने जीवन का हिस्सा मत बनाइए। यह एक ऐसी आग है, जो जलती तो है दूसरे को जलाने के लिए, पर अंततः हमें ही जला बैठती है। यह चिंगारी की तरह उठती है, पर ज्वालामुखी की तरह धधकती है। गुस्से में अगर आप नौकरी छोड़ देते हैं तो केरियर बर्बाद होगा। मोबाइल तोड़ रहे हैं तो धन बर्बाद होगा। दीवार से सिर टकरा रहे हैं तो शरीर बर्बाद होगा और परीक्षा नहीं दे रहे हैं तो वर्ष बर्बाद होगा। उन्होंने कहा कि अपने गुस्से पर नियंत्रण कीजिए। यह आपके स्वर्ग सरीखे घर को नरक बना रहा है और मधुर संबंधों में खटास घोल रहा है। गुस्सा करना दुर्भाग्य है तो प्रेम करना सौभाग्य है। गुस्से में आपके कारण किसी की आँख में आँसू आते हैं, पर प्रेम में आपके लिए दूसरों की आँखों में आँसू आते हैं।
संतप्रवर ने कहा कि अगर आप घर में बड़े हैं तो बड़प्पन भी रखिए। ज्यादा चीखने-चिल्लाने से घर का वातावरण कलुषित होता है। कृपया नरम लफ्ज़ों में ठोस बात कहिए। कड़क भाषा में हल्की बात मत कीजिए। आप गुस्सा बहुत कर चुके हैं और उसके अशुभ परिणाम भी देख चुके हैं। सबसे प्रेम करना शुरू कीजिए और अपने जीवन में शुभ परिणाम का सूर्याेदय देखिए।
उन्होंने सावधान करते हुए कहा कि गुस्सा हथौड़ा है और प्रेम चाबी है। हथौड़ा से ताला टूटता है और चाबी से खुलता है। अपनी भाषा में प्लीज़, थैंक्स और सॉरी जैसे शब्दों का पुनः प्रयोग कीजिए। इससे संबंधों में मिठास घुलेगा। नाराज होने पर किसी को सजा देने से पहले दो बार साचिये, दूसरों से गलती होने पर माफ कर दीजिए और खुद से गलती हो तो माफी मांगने में संकोच मत खाइये। अगर आप किसी की एक गलती को माफ करेंगे तो भगवान आपकी सौ गलतियों को माफ कर देगा।
संतप्रवर ने कहा कि सप्ताह में सातों दिन गुस्सा मत कीजिए। अगर सोमवार को गुस्सा आये तो अपने आप से कहिए आज सोमवार है, सप्ताह की शुरुआत कलह से न हो। मंगलवार को यह सोचकर गुस्सा मत कीजिए कि मंगल को कौन-सा अमंगल! बुध को क्यों करें युद्ध? गुरुवार को सोचो आज गुरु का दिन है। शुक्रवार शुक्रिया अदा करने का वार है। शनि को भूल से भी गुस्सा मत कीजिए, शनि की दशा लग सकती है। रविवार छुट्टी का दिन है - आज गुस्से की छुट्टी।
गुस्सा छोड़ने के टिप्स बताते हुए उन्होंने कहा कि जहाँ तक संभव हो, थोड़ी देर के लिए गुस्से को टाल दीजिए। कलुषित वातावरण में स्वयं को अनुपस्थित समझिए। पूर्व में किए गए गुस्से के परिणाम को याद कीजिए। क्रोध का जवाब मुस्कान से दीजिए और घर के आँगन की दीवार पर लिख दीजिए - मैं शांति और धैर्य से पेश आऊँगा।
कार्यक्रम के दौरान डॉ मुनि श्री शांति प्रिय सागर जी महाराज के 40 वें जन्मदिवस पर सभी श्रद्धालुओं और विद्यार्थियों द्वारा अभिनंदन किया गया। इस अवसर पर रमेश चौधरी परिवार द्वारा नई सोच नई उड़ान पुस्तक का वितरण किया गया। कार्यक्रम में विद्यालय परिवार और शहर के अनेक श्रद्धालु उपस्थित थे।
राष्ट्रसंत के कल 12 फरवरी गुरुवार को दशहरा मैदान के टाउन हॉल में सुबह 9 से 11 बजे तक जीवन को कैसे स्वर्ग बनाएं विषय पर सत्संग प्रवचन आयोजित होंगे।