नीमच। महावीर जिनालय में चल रही चातुर्मासिक आराधना के दौरान परम पूज्य विचक्षणा ज्योति मालव मणि प्रवर्तिनी महोदया चंद्रप्रभा श्रीजी महाराज साहब की सुशिष्या रत्न निधि श्रीजी महाराज साहब ने सम्यक दर्शन विषय पर प्रेरणादायी प्रवचन दिया।
रत्न निधि श्रीजी ने कहा कि सत्य और ईमानदारी के साथ परिश्रम एवं पुरुषार्थ करते हुए पवित्र भावना से धन कमाना चाहिए। व्यापार में छल-कपट से कमाया गया धन आत्मकल्याण के लिए सार्थक नहीं होता। ऐसे धन से पुण्य के बजाय पाप कर्म की वृद्धि होती है। इसलिए सदैव नीति, न्याय और ईमानदारी के मार्ग पर चलकर धन अर्जित करना चाहिए, तभी उसका सदुपयोग दान एवं धार्मिक कार्यों में किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि संसार की धन-संपत्ति और भौतिक संसाधनों के प्रति मोह-माया एवं लालच से बचना चाहिए। लालच मनुष्य के आत्मिक विकास में बाधक बनता है। उन्होंने कहा कि आधुनिक युग में सोना महंगा होने के बावजूद उसकी खरीदारी बढ़ रही है, जो बढ़ते लालच का संकेत है और चिंतन का विषय है। शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को आवश्यकता के अनुसार ही वस्तुओं की खरीदारी करनी चाहिए।
रत्न निधि श्रीजी ने कहा कि यदि परमात्मा के प्रति सच्ची श्रद्धा और भाव है तो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो सकता है, अन्यथा मनुष्य भौतिक संसार में ही भटकता रहता है। उन्होंने कहा कि परिश्रम एवं पुरुषार्थ से कमाया धन चोरी हो जाने पर व्यक्ति को अत्यधिक दुखी नहीं होना चाहिए। यह पूर्व कर्मों के उदय का परिणाम हो सकता है। इसलिए मनुष्य को सदैव पुण्य कर्म करते रहना चाहिए और परिग्रह से बचना चाहिए।
उन्होंने आलंबन और निमित्त की महत्ता समझाते हुए कहा कि धर्म साधना में संतों का निमित्त और उचित आलंबन मनुष्य को अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सहायक होता है। सम्यक दर्शन की प्राप्ति के बाद प्रत्येक व्यक्ति को पुण्य कर्म करते हुए मन को पवित्र बनाने और जीवन के तत्त्वों को समझने का प्रयास करना चाहिए।
पाप कर्मों से बचने का दिया संदेश-
प्रवचन के दौरान प्राचीन काल के मंत्री पैथर शाह का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि भोजन के अभाव में वह अपनी संतान को दुखी देखकर चिंतित रहते थे। एक समय भोजन मिलता था तो दूसरे समय नहीं मिलता था। उनके पूर्व कर्मों के उदय के कारण उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने श्रद्धालुओं को पाप कर्मों से बचने और पुण्य कर्म करने का संदेश दिया।
‘धूप और छांव’ चरित्र चित्रण से समझाया शील-संयम का महत्व
प्रवचन के दौरान चल रहे ‘धूप और छांव’ चरित्र चित्रण में वीर धवल राजा के प्रसंग के माध्यम से मोह, शील, तप एवं संयम के महत्व को समझाया गया। उदयभान और वीरभान के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने सदैव सत्य बोलने तथा तपस्या जैसे धार्मिक कार्यों में पवित्र भावना के साथ सहभागी बनने की प्रेरणा दी।
‘धूप और छांव’ के कथानक में आगे धवल रानी के प्रसंग में क्या होता है, इसकी जानकारी कथा के अगले क्रम में दी जाएगी।