चित्तौड़गढ़। पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के द्वितीय दिवस शांति भवन सैंथी में विराजित महासतियों के प्रवचन अनवरत जारी रहे। इस अवसर पर साध्वी प्रेरणा श्री ने अंतगढ़ सूत्र का वाचन किया।
स्पष्ट वक्ता साध्वी प्रेक्षा श्री ने कहा कि आत्मा में बसना पर्युषण है, जबकि दुनिया में बसना प्रदूषण है। सामयिक के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि सामयिक व्यक्ति को विभाव से स्वभाव की ओर ले जाती है। भटकते मन को स्थिर करने और आत्मकल्याण के लिए सामयिक आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि शरीर और आत्मा का भेद तब समझ में आता है, जब शरीर को कष्ट होता है। सामयिक स्व-आत्मकल्याण का महत्वपूर्ण साधन है। अनेक आत्माओं ने सामयिक की साधना के माध्यम से मोक्ष का मार्ग प्राप्त किया है। साधु की सामयिक को दीक्षा कहा जाता है, अर्थात जीवनभर के लिए सामयिक व्रत को अंगीकार करना।
साध्वी प्रेक्षा श्री ने कहा कि सामयिक में किसी प्रकार का विकार नहीं होना चाहिए। सभी साधनाएं समान हो सकती हैं, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति का साध्य अलग-अलग हो सकता है। यदि व्यक्ति अपने लक्ष्य से भटक गया तो उसे मंजिल प्राप्त करना कठिन हो जाता है। सामयिक मोक्ष प्राप्ति का साधन है।
उन्होंने बताया कि साधु की सामयिक तीन करण और तीन योग की होती है, जबकि श्रावक की सामयिक दो करण की होती है। श्रावक को पूरी वेशभूषा और उचित भाव के साथ सामयिक करनी चाहिए, तभी सामयिक के वास्तविक भाव उत्पन्न होते हैं। प्रातःकालीन सामयिक को विशेष रूप से शुद्ध माना गया है। शांत वातावरण में सामयिक करने से मन और तन दोनों प्रफुल्लित होते हैं।
उन्होंने कहा कि सामयिक में तप और आराधना का भाव निहित है। यदि क्रोध की आग को बुझाना है, मन की चंचलता को शांत करना है अथवा आत्मा को सुखी बनाना है तो सामयिक अवश्य करनी चाहिए।
मर्यादित जीवन ही मोक्ष मार्ग की ओर ले जाता है
साध्वी प्रतिभा श्री ने ‘जैनम् जयति शासनम्’ के साथ अपने व्याख्यान में कहा कि जीवन में मर्यादा का होना आवश्यक है। मर्यादित जीवन ही व्यक्ति को मोक्ष मार्ग की ओर ले जा सकता है। उन्होंने कहा कि अग्नि, पानी और हवा तीनों अनियंत्रित हो जाएं तो विध्वंस की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उसी प्रकार व्यक्ति के जीवन में भी मर्यादा और संयम आवश्यक हैं।