चित्तौड़गढ़। श्री राम द्वारा बूंदी रोड, दिल्ली गेट, चित्तौड़गढ़ में श्रीमद् भागवत कथा का मंगलाचरण हुआ । भागवत जी की पूजा अर्चना संत रमता राम जी एवं दिग्विजय राम जी द्वारा की गई, उसके बाद भक्तों के सिर पर भागवत जी को धराया गया। व्यास पीठ पर अंतर्राष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय शाहपुरा के संत रमता राम जी महाराज के शिष्य दिग्विजय राम जी विराजमान थे।
संत दिग्विजय राम जी ने कहा कि प्राणी के भवसागर से पार होने की नौका श्रीमद् भागवत महापुराण है। व्यक्ति जब तक किसी चीज का महत्व नहीं समझता जब तक उसमें उसकी रुचि जागृत नहीं होती है जब तक मन रूपी पात्र साफ नहीं होता है तब तक उसमे खीर रूपी भागवत नही परोसी जा सकती हैं , अतः व्यक्ति को भागवत सुनने से पूर्व अपना मन निर्मल कर लेना चाहिए। जहां भागवत होती है वहां स्वयं भगवान श्री कृष्णा विराजमान होते हैं, मनुष्यों को प्रपंच से बचकर भाव से कथा सुनना चाहिए । जो व्यक्ति को ज्ञान ,भक्ति, वैराग्य प्रदान करती है वही भागवत है। भागवत मनुष्य को बार-बार मरने से बचाती हैं अर्थात बार-बार मरने के कर्म से मनुष्य को मुक्ति मिल जाती है। संसार में शरीर की शुद्धता के लिए तो काफी साधन है परंतु मन के मेल को केवल भागवत ही साफ कर सकती है भागवत से व्यक्ति का मन निर्मल हो जाता है। इस संसार में व्यक्ति जीव माया को पकड़ कर चलता है इसलिए हमेशा दुखी रहता है यदि पकड़ना ही है तो ईश्वर के चरणों को पकड़ना चाहिए ताकि मुक्ति मिल सके। इस संसार में सब कुछ परिवर्तनशील है केवल दो ही चीज अ परिवर्तनशील है आत्मा व परमात्मा। प्रभु भजन व राम सुमिरन सुख प्रदान करती है । संत दिग्विजय राम जी ने भागवत सुनने के कुछ नियम बताएं उनकी पालन करते हुए भागवत कथा सुनना चाहिए प्रथम हो सके तो भागवत सुनने वाले व्यक्ति को व्रत करना चाहिए दूसरा भागवत श्रद्धापूर्वक भक्ति के साथ सुनना चाहिए किसी भी व्यक्ति की निंदा नहीं करना चाहिए भगवत चरणों में प्रेम जागृत कर भागवत कथा सुनना चाहिए। भागवत सदा ग्रहण करने योग्य हैं भागवत को रस के समान श्रवण करना चाहिए ।