नीमच। कानूनी रूप से प्रत्येक 5 वर्ष में किए जाने वाले न्यूनतम वेतन पुनरीक्षण को 9 वर्ष बाद करने के बाद पिछले 9 माह से प्रदेश की भाजपा सरकार व उद्योगपतियों/मालिकों ने इसे कानूनी दांव पेंच में उलझा दिया। गत 3 दिसम्बर को माननीय म.प्र. उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने स्थगन समाप्त करने के बाद भी प्रदेश सरकार ने बजाए स्पष्ट आदेश जारी करने के इस और लटकाए रखने का खेल खेला। माननीय उच्च न्यायालय के आदेश का एक माह से भी ज्यादा समय तक परिपालन न किए जाने की स्थिति में 6 जनवरी 2025 को सीटू प्रदेश महासचिव प्रमोद प्रधान की ओर से अधिवक्ता बाबूलाल नागर ने प्रमुख सचिव (श्रम) व श्रमायुक्त को न्यायालय की अवमानना की कार्रवाई संबंधी नोटिस जारी किया। नोटिस मिलते ही सरकार हरकत में आई और 8 जनवरी 2025 को महाधिवक्ता कार्यालय ने श्रमायुक्त को स्पष्ट अभिमत देते हुए कहा कि 1 अप्रैल 2024 से बड़ी हुई दरों सम्बन्धी निर्णय पर अमल किया जाना चाहिए। सीटू प्रदेश अध्यक्ष रामविलास गोस्वामी प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष शैलेंद्र सिंह ठाकुर व महासचिव प्रमोद प्रधान ने प्रेस को उपरोक्त जानकारी देते हुए कहा कि अब श्रमायुक्त कार्यालय को बढ़ी हुई दरों के एरियर सहित भुगतान के आदेश शीघ्र जारी करना चाहिए।
सीटू जिला समिति नीमच के कार्यकारी अध्यक्ष किशोर जवेरिया व सचिव मुकेश नागदा ने कहा है कि सीटू के संघर्षों से यह उपलब्धि मिली है। नेताओं ने कहा कि तमाम प्रमाणित तथ्य यह बताते हैं कि 3 दिसंबर के माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी सरकार इसको उलझाए रखना चाहती थी। नेताओं ने कहा कि यही कारण है कि 3 दिसंबर के निर्णय के 20 दिन बाद (23 दिसंबर) को श्रमायुक्त कार्यालय ने महाधिवक्ता कार्यालय को पत्र लिखा और निर्णय के वैधानिक पक्ष पर उनका अभिमत मांगा। इस पत्र के 15 दिन तक कोई अभिमत नहीं मिला पर श्रमायुक्त कार्यालय ने भी कोई रिमाइंडर (स्मरण-पत्र) तक नहीं भेजा। यदि 6 जनवरी 2025 को सीटू की ओर से अवमानना का नोटिस नहीं गया होता तो सरकार अभी तक चुप्पी साधी रहती। नेताओं ने कहा अब यह स्पष्ट अभिमत मिल गया है इसलिए श्रमायुक्त को तुरंत आदेश जारी कर एरियर सहित भुगतान सुनिश्चित करना चाहिए। नेताओं ने कहा कि यदि तुरंत आदेश जारी नहीं हुए तो सीटू श्रमायुक्त कार्यालय पर डेरा डालो-घेरा डालो आंदोलन करेगी।