नीमच। श्रावण पूर्णिमा पर देशभर के साथ नीमच जिले के कुंडला गांव में भी रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है, लेकिन यहां रक्षाबंधन के पांच दिन बाद आने वाली पंचमी का उत्सव इससे भी बड़ा और खास माना जाता है। इस दिन 50 से अधिक गांवों में ब्याही कुंडला की बेटियां अपने मायके लौटती हैं और भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधने की अनूठी परंपरा निभाती हैं।
बुजुर्गों के फैसले से बनी अनूठी परंपरा-
कुंडला की इस अनूठी सामाजिक परंपरा का जुड़ाव गांव के प्राचीन तालाब किनारे स्थित कालेश्वर महादेव मंदिर से है। रक्षाबंधन के पांच दिन बाद पंचमी पर मंदिर का स्थापना दिवस भी मनाया जाता है। इसी अवसर पर दो दिवसीय विशाल ग्रामीण मेले का आयोजन होता है।
ग्रामीणों के अनुसार, वर्षों पहले किसी कारणवश कई बहनें रक्षाबंधन पर मायके नहीं पहुंच पाती थीं। ऐसे में गांव के बुजुर्गों ने पंचमी के मेले के दिन को ही बहनों के मायके आने और भाइयों को राखी बांधने का प्रमुख अवसर तय किया। धीरे-धीरे यह परंपरा गांव की पहचान बन गई और आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाई जा रही है।
कालेश्वर मंदिर में गूंजते हैं शंख-घंटे-
पंचमी की अलसुबह से ही तालाब किनारे स्थित कालेश्वर महादेव मंदिर में शंख और घंटियों की गूंज सुनाई देने लगती है। दूर-दराज के गांवों से पहुंची बेटियां अपने भाइयों के साथ भगवान कालेश्वर महादेव के दर्शन कर आशीर्वाद लेती हैं। इसके बाद मंदिर परिसर अथवा घर के आंगन में बहनें भाइयों का तिलक कर उनकी कलाई पर रक्षासूत्र बांधती हैं।
राखी बांधने के बाद परिवार के सदस्य तालाब किनारे लगने वाले मेले में पहुंचते हैं। इस दौरान गांव का माहौल उत्सवमय हो जाता है।
मेला नहीं, रिश्तों को जोड़ने का पर्व
दो दिवसीय मेले में चाट-पकौड़ी की दुकानों के साथ रंग-बिरंगे झूले, खिलौनों और अन्य सामग्री की दुकानें सजती हैं। दिनभर यहां परिवारों की भीड़ लगी रहती है। हजारों ग्रामीणों की मौजूदगी में यह आयोजन केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि दूर-दराज में बसे परिवारों और रिश्तों को फिर से जोड़ने का अवसर भी बन जाता है।
कुंडला की यह परंपरा भक्ति, पारिवारिक स्नेह और भाई-बहन के अटूट रिश्ते का अनूठा संगम है। यही वजह है कि पंचमी का पर्व गांववासियों के लिए रक्षाबंधन से भी अधिक विशेष और भावनात्मक महत्व रखता है।