नीमच। किसी समय नीमच की जीवनरेखा मानी जानी वाली कृष्णावली नदी, गंदे पानी, गंदगी और जिम्मेदारों की उदासीनता के चलते गंदे नाले में तब्दील हो गई है। कभी इसके घाटों पर जन्म से लेकर मरण तक के कर्मकाण्ड हुआ करते थे। कई मंदिरों की स्थापना इसके किनारों पर की गई, जो कभी षहरवासियों की धार्मिक आस्था का केन्द्र हुआ करते थे, लेकिन आज यह नदी दम तोड रही है।
कृष्णावली नदी के किनारे बसे नीमच षहर के बुजुर्ग इसे पवित्र नदी बताते हैं। वे बताते हैं कि इस नदी का पानी कभी कांच की तरह स्वच्छ और पवित्र हुआ करता था। इसमें स्नान और तर्पण के साथ साथ तैराकी प्रतियोगिताएं होती थीं। इसके घाटों पर मंदिर, मस्जिद और अखाडे होने से लोग सुबह-षाम जाया करते थे। इसके किनारों पर जायसवाल समाज सहित षंभू व्यायामषाला पर पक्के घाट बने हुए थे, जहां महिलाएं कार्तिक मास में स्नान एवं दीपदान करती थीं। श्रावण में षिवघाट पर पूरे महीने श्रद्धालु स्नान पूजा करते थे, वहीं षंभू व्यायामषाला पर पहलवान इसमें स्नान कर खुद को तरोताजा करते थे। इन घाटों पर जीवन-मरण के कई धार्मिक कर्मकाण्ड सम्पन्न होते थे। महाषिवरात्रि पर यहां बडा मेला लगता था, जो अब बंद हो गया है। जिस तरह आज किलेष्वर और भूतेष्वर पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बढी है, वैसी आवाजाही कभी षिवघाट, खेडापति बालाजी, सत्यनारायण मंदिर व अन्य धार्मिक स्थलों पर हुआ करती थी, तब तक यह नदी स्वच्छ थी। पुराने समय में लोग सुबह इसी नदी या इसके किनारे बने धार्मिक स्थलों पर नहाते, कपडे धोते और मंदिरों में दर्षन कर वापस आते थे। धोबी घाट पर कपडे धोए जाते थे।
राजस्थान के केसुन्दा और जयसिंहपुरा होती हुई यह नदी षिवघाट, प्रायवेट बस स्टेण्ड, नीमच सिटी तक जाती है। इसमें राजस्थान और मध्यप्रदेष के कई बरसाती नाले भी आकर मिलते थे। नदी के दोनों ओर आम, इमली, नीम, पीपल, बरगद के पेड लगे हुए थे।
पवित्र नदी से सडांध मारते नाले में तब्दील हुई कृष्णावली
जनप्रतिनिधियों एवं आमजन की उदासीनता के चलते पवित्र कृष्णावली नदी आज सडांध मारते गंदे नाले में तब्दील हो गई है। अफीम फैक्ट्री के केमिकलयुक्त गंदे पानी का नाले सहित आसपास की बस्तियों का गंदा पानी भी इसमें छोडा जा रहा है। लम्बे समय से नदी का गहरीकरण नहीं किया गया है। सालों से जलकुंभी और गंदगी को अनदेखा किया जा रहा है। नदी के गंदे पानी की भी चोरी की जा रही है।
कृष्णावली की समुचित साफ सफाई से षहर को नजदीक ही मिल सकता है अच्छा पिकनिक स्पॉट
यदि आमजन एवं जनप्रतिनिधि इसमें मिलने वाले गंदे नालों को रोककर, नदी की साफ-सफाई, गहरीकरण और सौन्दर्यीकरण की ओर समुचित ध्यान दें तो षहर के नजदीक एक अच्छा पिकनिक स्पॉट विकसित हो सकता है। नदी में फव्वारे और नाव चलाई जा सकती है, उद्यान विकसित किया जा सकता है, जहां षहरवासी सुबह षाम परिवार के साथ ताजी हवा में सैर का आनंद ले सकें। इसके आसपास खाने-पीने और दीगर स्टॉल लगने से युवाओं को तो रोजगार उपलब्ध होगा ही, साथ ही अधिक मात्रा में बारिष का पानी एकत्रित होने से भूजल स्तर में भी वृद्धि होगी। फिलहाल नीमच का तीन दिषाओं में विस्तार हो रहा है। नदी और इसके घाटों का सौन्दर्यीकरण होगा तो आसपास की भूमियों पर नए रहवासी एवं व्यवसायिक प्रोजेक्ट आकार लेंगे और षहर का चौतरफा विकास होगा।
नदियों के किनारे होता है सभ्यता और संस्कृति का निर्माण
भारतीय सभ्यता और संस्कृति में नदियों का खासा महत्व रहा है। एक अच्छी सभ्यता से स्वस्थ समाज विकसित होता है। नदी अपने आसपास रहने वाले लोगों के लिए जीवनरेखा है। नदी के किनारे रहने वाले समाज के, जन्म से लेकर मरण तक जो भी संस्कार होते थे, उससे संस्कृति का निर्माण होता था। इसलिए नदियों का मानव सभ्यता के विकास में अमिट प्रभाव है। इसके बिना सभ्यता और संस्कृति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। चाहे पुरानी मानव सभ्यताओं का जिक्र कर लें या नए षहरीकरण की बात करें, नदियों के बगैर कुछ भी मुमकिन नहीं है। नदी के जल में तांबे के सिक्के डालना, दीपदान, तर्पण, अस्थि विसर्जन इत्यादि क्रियाएं केवल धार्मिक विधि विधान ही नहीं है वरन इन सबका वैज्ञानिक महत्व भी है।
गहरीकरण और साफ सफाई न होने से हर साल नदी के किनारे बस्तियों में घुसता है पानी
नदी पर अतिक्रमण बढने, जलकुंभी और गंदगी की सफाई न होने व गहरीकरण नहीं करने से बारिष के समय इसके किनारे स्थित बस्तियों में पानी घुसता है। कई बार जान-माल के नुकसान की आषंका बनी रहती है, लेकिन तब राहत और बचाव कार्य कर इतिश्री कर ली जाती है। समस्या की मूल जड को खत्म करने के प्रयास अभी तक नहीं किए गए हैं। जनप्रतिनिधि और आमजन मिलकर यदि श्रमदान करें तो कभी षहर की जीवनरेखा कहलाने वाली कृष्णावली नदी फिर से अपना खोया वैभव प्राप्त सकती है, लेकिन आवष्यकता है सच्चे और ईमानदार प्रयासों की।