दूदरसी। यहां सात दिवसीय श्री मद्भागवत गीता महापुराण कथा का आयोजन अनवरत जारी है। कथा के पांचवें दिन भगवान श्री कृष्ण के अवतार पर किस तरह से बंदीगृह के ताले खुल जाते हैं सभी प्रहरी गहरी नींद में सो जाते हैं इस प्रसंग पर भागवताचार्य पंडित मुकेश दास महाराज ने बहुत ही सुंदर वर्णन प्रस्तुत किया है आपने बताया कि जैसे ही भगवान का बाल कृष्ण के रूप में अवतार हुआ सभी प्रहरी सो गए वासुदेव की बेड़ियां खुल गई और वह पालने में लेकर गोकुल गांव जाने लगे तो यमुना के गहरे जल में जाने में असहज होने लगे तो बालकृष्ण ने अपना पांव लंबा किया जैसे ही जल को छुआ तो जलस्तर समान हो गया। नंदबाबा के घर भी उसी वक्त महामाया ने बालिका के रूप में जन्म लिया था वहां कृष्ण को यशोदा के पास लिटाकर बालिका को लेकर आ गए। पंडित श्री ने वहां गोकुल में नंद जी के घर लल्ला होने पर सभी ग्वाल ग्वालिन बधाई देने पहुंचे इस बीच पूतना राक्षसी भी वहां पहुंच गई।
गुरूजी ने बताया कि कैसे बालकृष्ण ने पूतना का वध किया। जब पूतना ने अपनी माया शक्ति से सुंदर रूप धारण किया और बधाई देने बालकृष्ण के पास पहुंची कृष्ण ने पहचान लिया और मन में कहा आओ मौसी। पूतना ने मौका पाते ही कृष्ण को उठा लिया अपने स्तनों पर लगा भयंकर बिष का रसपान कराने लगी तो कृष्ण ने दुग्ध पान करते करते उसके प्राण ही हर लिए। जब कृष्ण बड़े हुए और ग्वालों के साथ धेनू चराने गए तो वहां अजासुर नामक राक्षस ने अपना विकराल रूप बनाया और ऐसा लग रहा था मानो बहुत बड़ी गुफा हो सभी खेलते हुए उस गुफा में चले गए तो उसने अपना मुंह बंद कर दिया। सभी घबरा गए और कृष्ण से विनती करने लगे। पंडित श्री ने इस करुणा रूपी दृश्य को बताते हुए कहा कि कृष्ण ने भी अपना शरीर को इतना बड़ा फैलाया कि उसका पेट फट गया और सभी ग्वाल बाल सुरक्षित बाहर आ गए इस प्रकार कृष्ण ने उस दैत्य का बध किया। आपने बताया कि कृष्ण ने बालरूप में ही बका सुर छकटा सुर जैसे दैत्यों का वध किया।
इन्द्र का घमंड तोड़ कर परे गोकुल गांव की रक्षा की। गुरूजी ने बताया कि एक बार गोकुल वासियों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा की थी तो इंन्द्र को गुस्सा आया और उसने जो पानी बरसाना शुरू किया पूरे गोकुल में त्राहि-त्राहि मच गई सभी कृष्ण की शरण में गए और रक्षा की प्रार्थना की। कृष्ण ने अपनी तर्जनी ऊंगली से गोवर्धन पर्वत उठाया और गोकुल की रक्षा की।
इस अवसर आपने श्रोताओं को श्री कृष्ण लीला के ऊपर भी सुंदर वर्णन किया कि गोपियां रोज यमुना में नहाने जाती थी तो वह सभी निर्वस्त्र होकर नहाती थी यह बात कृष्ण को अच्छी नहीं लगती थी एक बार जैसे ही गोपियां यमुना में नहाने गई और कृष्ण ने उनके वस्त्र चुरा लिए और कदम के पेड़ पर बैठ गए। गोपियां जैसे ही पानी से बाहर आई तो वहां वस्त्र नहीं पाकर दुःखी हो गई और देखा तो कृष्ण ने वस्त्र चुराकर कदम पर बैठा है सभी ने मन्नत मांगी लेकिन कृष्ण ने एक शर्त रखी कि आज के बाद निर्वस्त्र होकर नहीं नहाओगी सभी ने माफी मांगी जब उनके वस्त्र लौटाए।
गुरूजी ने इस अवसर पर इसी प्रसंग के ऊपर एक संगीत मय भजन प्रस्तुत किया जिस पर पांडाल में उपस्थित सभी नाचने। लगे ले गयो चीर मुरारी मैं हारी श्याम जल जमुना के तीर नामक भजन पर श्रोताओं ने खूब तालियां बजाई और पूरा पांडाल भक्ति रस में डुब सा गया। तत्पश्चात आरती की गई और आज भागवत भगवान श्रीकृष्ण के छप्पन भोग का प्रसाद चढ़ाया गया फिर सभी भक्तों को प्रसाद बांटी गई।