दूदरसी। यहां कन्हैयालाल दमामी की ओर से सात दिवसीय श्री मद्भागवत गीता महापुराण का आयोजन अपने स्वर्गीय माता पिता की पुण्यस्मृती किया जा रहा है।आज छटवे दिन भागवताचार्य ने वीर रस भक्ति रस और श्रृंगार रस के उपर शानदार व्याख्यान दिया। कथा के प्रारंभ में पंडित श्री ने भक्ति रस के उपर श्रोताओं को बताया कि वृंदावन की गोपियां जब भगवान श्री कृष्ण के साथ रासलीला कर रही थी तो सभी अपने आप को श्री कृष्ण की प्रेयसी के रूप में श्रृंगार कर नृत्य कर रही थी और उनको अभियान हो गया था कि कृष्ण तो हमारे बस में हैं और राधा को मान था कि मैं कृष्ण के बस में हूं यही भक्ति भाव को परिलक्षित करती है तो कृष्ण वहां से अदृश्य हो गए।
आपने वीर रस क बहुत ही सुंदर शब्दों में वर्णन किया है कि कृष्ण और बलराम जब मथुरा में कंस के दरबार में पहुंचे तो कंस के योद्धा चारूण और मुश्टिक ने युद्ध के लिए ललकारा कहां ये भारी-भरकम मल्ल और कहां ये नादान बालक ।बलराम और कृष्ण ने दोनों दुष्टों को मार गिराया तभी कंस ने तलवार से दोनों भाइयों पर हमला कर दिया तभी कृष्ण ने उसे सिंहासन ने नीचे गिरा दिया और एक मुश्टिक के प्रहार से उसका वध कर दिया ।
पंडित जी ने श्रृंगार रस को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया कि कंस का चंदन लेप लगाने वाली कुब्जा का श्री कृष्ण ने सुंदर रुप देकर उसका जीवन धन्य कर दिया। कथा के अंत में भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का विवाह धूमधाम से ढौल और नगाड़े के साथ गाजे-बाजे की संगीतमय भजन के साथ संपन्न हुआ। जैसे ही श्री कृष्ण और रूक्मिणी का वेश धारण कर दो बालिकाओं ने पांडाल में प्रवेश किया उपस्थित श्रद्धालुओं ने पुष्प वर्षा कर स्वागत किया दोनों ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाई और विवाह संपन्न हो गया।
इस अवसर पर भागवताचार्य ने एक सुंदर भजन प्रस्तुत किया सखियों मुझे मेंहदी लगाओ,मेरा श्रृंगार कराओ मुझे श्री कृष्ण की दुल्हन बनाओ पर पुरा पांडाल नृत्य करते हुए गा रहा था बधाई हो बधाई कृष्ण रुक्मिणी जी को बधाई। अंत में श्री श्री भागवत भगवान् की आरती की गई भगवान को सुखामेवा व हलूआ का भोग लगाया गया तत्पश्चात सभी श्रोताओं को प्रसाद बांटा गया।