नीमच। समीपस्थ राज्य राजस्थान की पावन धरती पर स्थित दाऊदी बोहरा समाज की विश्वविख्यात दरगाह गलियाकोट शरीफ आस्था, मोहब्बत और रूहानी सुकून का मजबूत प्रतीक मानी जाती है। यहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु अपनी दिली मुरादें लेकर बाबजी मौला सैयदी फखरुद्दीन शहीद के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। मान्यता है कि जो भी सच्चे मन से यहां आता है, वह कभी खाली हाथ नहीं लौटता।

बाबजी मौला की दरगाह पर मजहब की कोई दीवार नहीं है। यहां सभी धर्मों के लोग समान श्रद्धा के साथ सिर झुकाते हैं। इसी कारण गलियाकोट शरीफ को हिंदू-मुस्लिम एकता और भाईचारे की जीवंत मिसाल के रूप में देखा जाता है। जायरीन बताते हैं कि दरगाह में प्रवेश करते ही मन को अद्भुत शांति का अनुभव होता है, मानो जीवन की सारी चिंताएं यहीं छूट जाती हों।

मान्यता के अनुसार बाबजी मौला के दरबार में सच्चे दिल से मांगी गई हर दुआ कबूल होती है। रोज़ी-रोज़गार, बीमारी से निजात या जीवन की किसी कठिनाई का समाधान- हर मुराद के साथ जायरीन यहां उम्मीद की नई रोशनी पाते हैं। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु इस विश्वास के साक्षी हैं कि बाबजी मौला कभी किसी को मायूस नहीं लौटाते।

इसी आस्था और विश्वास के साथ नीमच की बोहरा कॉलोनी, स्कीम नंबर 36 से शनिवार को 50 जायरीनों का जत्था गलियाकोट शरीफ पहुंचा। ज़ियारत के दौरान जायरीनों ने विशेष रूप से दाऊदी बोहरा समाज के 53वें धर्मगुरु डॉ. सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन साहब के नीमच तशरीफ लाने तथा उनके दीर्घायु होने की दुआ की। साथ ही देश, शहर और समाज में अमन, तरक्की और भाईचारे के लिए भी प्रार्थनाएं की गईं।

उल्लेखनीय है कि गलियाकोट शरीफ स्थित बाबजी मौला की दरगाह विश्वास का वह मुकाम है, जहां बिखरी उम्मीदें सिमटती हैं और परेशान इंसान मुस्कुरा उठता है। यह दरबार आज भी आस्था और इंसानियत के दीयों से रोशन है।
