नीमच। धर्म और संस्कारों के पालन से जीवन में सुख, समृद्धि और मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। धर्म के बिना मानव जीवन की कोई सार्थकता नहीं है। जो व्यक्ति धर्म की रक्षा करता है, उसकी रक्षा स्वयं धर्म करता है। उक्त विचार वृंदावन धाम, मथुरा के प्रख्यात श्रीमद्भागवत उपासक श्री श्रीजी बाबा महाराज के सुपुत्र, ब्रज विभूषित श्रीमद्भागवत आचार्य संत श्री रमाकांत गोस्वामी ने व्यक्त किए।
वे सिंघल परिवार द्वारा कमल अग्रसेन भवन में आयोजित श्रीमद्भागवत ज्ञान गंगा के दौरान श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि धर्म को जीवन में आत्मसात करने से व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठा मिलती है, जबकि धर्महीन जीवन पशु समान होता है।
संत श्री रमाकांत गोस्वामी ने कहा कि हिंदू धर्म की रक्षा के लिए प्रत्येक हिंदू परिवार को संस्कारयुक्त संतान का पालन-पोषण करना चाहिए। आजादी के बाद देश में हिंदू जनसंख्या में गिरावट चिंताजनक विषय है। उन्होंने कहा कि जैसा कर्म होता है, वैसा ही फल मिलता है। पुण्य कर्म करने से सुख और पाप कर्म करने से नरक की प्राप्ति होती है।
उन्होंने बताया कि गीता, भागवत और रामायण का श्रवण करने से व्यक्ति कभी नरक का भागी नहीं बनता। श्रीमद्भागवत कथा आयुर्वेद की औषधि के समान है, जो मानव को निरोगी जीवन जीने की प्रेरणा देती है। बच्चों को बचपन से ही धार्मिक संस्कार, सत्संग और भजन-कीर्तन की शिक्षा देना आवश्यक है। प्रत्येक परिवार को प्रतिदिन कम से कम 30 मिनट धार्मिक चर्चा अवश्य करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि हनुमान जी बल और बुद्धि के दाता हैं। मीरा बाई प्रतिदिन ब्राह्मणों के साथ भक्ति भाव से भजन किया करती थीं। प्रार्थना भगवान से संवाद का माध्यम है। ध्रुव बालक ने अल्पायु में कठोर तपस्या कर भगवान की गोद प्राप्त की और दीर्घकालीन राज्य का वरदान पाया।
संत श्री ने कहा कि गणेश उत्सव की शुरुआत सामाजिक एकता के उद्देश्य से की गई थी, लेकिन आज वह प्रतिस्पर्धा तक सीमित हो गया है। हिंदू समाज को संगठित रहना होगा तभी वह सुरक्षित रह सकेगा। तपस्या से जीवन की बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान संभव है। मीरा, नानक और कबीर ने भक्ति और साधना से आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त किया।
उन्होंने यह भी कहा कि हम दिखावे के लिए दान करते हैं, लेकिन जीवन भर सेवा करने वालों की उपेक्षा कर देते हैं, जो अनुचित है। जैसा अन्न ग्रहण करते हैं, वैसा ही मन बनता है और जैसा जल पीते हैं, वैसी ही वाणी होती है। भगवान को भोग अर्पित करने के बाद ही प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। तुलसी माला धारण करना और नियमित मंदिर दर्शन करना मंगलकारी होता है।
कथा में अजामिल प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि भगवान का नाम स्मरण करने से जीवन का कल्याण और मोक्ष की प्राप्ति होती है। बच्चों का नाम भगवान के नाम पर रखने से भी पुण्य की प्राप्ति होती है।
भागवत कथा की आरती में भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष पवन पाटीदार, रामचंद्र सैनी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। कथा के दौरान महिलाएं हरे रंग के परिधान में सहभागी बनीं। इस अवसर पर सनातन धर्म से जुड़े विभिन्न प्रश्नों के उत्तर भी महाराज श्री ने दिए।
कथा में कन्हैया की माखन लीला, भक्त प्रह्लाद, हिरण्यकश्यप, ध्रुव, राजा परीक्षित, अजामिल, नारद मुनि, राजा भरत, सुनीति, सुरुचि, ऋषभदेव सहित श्रीमद्भागवत के अनेक प्रसंगों का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महत्व प्रतिपादित किया गया।
उल्लेखनीय है कि यह श्रीमद्भागवत कथा 22 से 28 दिसंबर तक प्रतिदिन दोपहर 2 बजे से शाम 6 बजे तक कमल अग्रसेन भवन सभागार में आयोजित की जा रही है।