चित्तौड़गढ़। गांधीनगर स्थित समता भवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए महासती पूर्वीश्री ने साधना और आराधना के माध्यम से जीवन में समता भाव विकसित करने का संदेश दिया। उन्होंने भजन ‘तेरे सुख की एक दिशा है, तू भीतर आ, तू भीतर आ’ के माध्यम से श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित किया।
महासती ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को विचार करना चाहिए कि उसकी आंतरिक दशा कैसी है। आत्मा का मूल स्वभाव ज्ञान और दर्शन से संपन्न होना है। क्रोध, मान, माया, लोभ, स्वार्थ, राग और द्वेष आदि विभाव हैं, स्वभाव नहीं। उन्होंने कहा कि परिस्थितियां और घटनाएं जीवन में आती-जाती रहेंगी, लेकिन हर परिस्थिति में अपने स्वभाव में रहते हुए शांत और मधुर बने रहना ही साधना है।
उन्होंने कहा कि वाणी का प्रयोग सदैव संयम के साथ होना चाहिए। सत्य बोलें, लेकिन वाणी कटु न हो। स्वयं शांत रहें और दूसरों को भी शांत रहने दें। किसी के व्यवहार से मन विचलित न हो, बल्कि वाणी से समता और प्रेम का भाव प्रकट होना चाहिए।
महासती पूर्वीश्री ने कहा कि साधना, आराधना, सत्संग और धर्मस्थान जाने का उद्देश्य केवल परंपरा का निर्वहन नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य जीवन में ऐसा परिवर्तन लाना होना चाहिए, जिससे स्वयं और दूसरों का जीवन आनंदमय बने तथा भीतर के भाव जागृत हों। उन्होंने कहा कि मन की इच्छा और तृष्णा के पीछे चलने के बजाय आत्मा के स्वभाव के अनुरूप जीवन जीना चाहिए।
उन्होंने साधना के लिए धैर्य और स्पष्टता को आवश्यक बताते हुए कहा कि जिस प्रकार एक बालक धीरे-धीरे बोलना, पढ़ना और लिखना सीखता है, उसी प्रकार साधना में भी निरंतरता और धैर्य से सफलता प्राप्त होती है। प्रवचन सुनते समय यह भाव होना चाहिए कि संदेश स्वयं के लिए है और उसमें बताए गए मार्ग के अनुसार जीवन में परिवर्तन लाना है।
महासती ने कहा कि प्रार्थना, साधना और आराधना केवल शब्दों के उच्चारण तक सीमित न रहें, बल्कि उनमें भाव और आचरण भी जुड़ना चाहिए। मन की अपेक्षाओं और अनावश्यक विचारों से दूरी बनाकर आत्मा की आवाज सुनने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने प्रभव चोर के जीवन का उदाहरण देते हुए बताया कि जिनवाणी श्रवण और साधना-आराधना के प्रभाव से उन्होंने जीवन का लक्ष्य प्राप्त किया और भगवान महावीर के तीसरे पट्टधर बने।
इससे पूर्व महासती सुश्रीया ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन की आवश्यकताओं के अतिरिक्त अनावश्यक वस्तुओं के प्रति आसक्ति कम करनी चाहिए। उन्होंने अहिंसा को जीवन में अपनाने, अनावश्यक कर्मबंधन से बचने और सीमित आवश्यकताओं के साथ जीवन जीने का संदेश दिया। साथ ही प्रकृति एवं संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग तथा अनावश्यक आसक्ति को कम करने पर जोर दिया।
धर्मसभा के दौरान महासती ने एकासन, आयंबिल, उपवास आदि के प्रत्याख्यान कराए तथा मंगल पाठ सुनाया। कार्यक्रम का संचालन संघ अध्यक्ष शंकर सुराणा ने किया।