उज्जैन। बे-औलाद दंपति की गोद भरने, चिंता हरने और मनोकामना पूरी करने वाले उज्जैन के चिंतामन गणेश बच्चों को मोबाइल से दूर रहने की सीख भी दे रहे हैं। यहां 2 हजार से ज्यादा बच्चों को मोबाइल नहीं उठाने की शपथ दिलाई जा चुकी है। यहां एक ही पत्थर में तीन स्वरूपों में दर्शन देने वाले श्री गणेश को भगवान राम-सीता ने भी पूजा था। उनके अभिषेक के लिए लक्ष्मण ने भूमि में बाण मारकर गंगा को प्रकट किया था। गणेश उत्सव के 10 दिन इस मंदिर में भारी भीड़ रहेगी। श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर पहुंचेंगे।
उज्जैन शहर से करीब 7 किलोमीटर दूर स्थित चिंतामन गणेश मंदिर में एक ही पत्थर में भगवान गणेश को चिंतामन गणेश, इच्छामन गणेश और सिद्धिविनायक के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि चिंतामन गणेश चिंता हरते हैं, इच्छामन मनोकामना पूरी करते हैं और सिद्धिविनायक रिद्धि-सिद्धि प्रदान करते हैं। गणेश चतुर्थी पर मंदिर में विशेष सजावट की गई है। सुबह से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं।
राम-लक्ष्मण-सीता ने किया था प्रथम पूजन
मंदिर के मुख्य पुजारी गणेश गुरु के अनुसार मंदिर से जुड़ी मान्यता त्रेता युग से जुड़ी है। मान्यता है कि 14 वर्ष के वनवास के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता यहां पहुंचे थे। वटवृक्ष के नीचे भगवान गणेश के स्वयंभू स्वरूप के प्रकट होने की मान्यता है।
कहा जाता है कि भगवान राम ने चिंतामन गणेश, लक्ष्मण ने इच्छामन गणेश और माता सीता ने सिद्धिविनायक का पूजन किया था। इसी वजह से तीनों स्वरूपों को एक ही पाषाण पर विराजित होने की मान्यता मंदिर की प्रमुख विशेषता मानी जाती है।
लक्ष्मण के बाण से निकली जलधारा
मान्यता के अनुसार उस समय भगवान गणेश के अभिषेक के लिए जल उपलब्ध नहीं था। लक्ष्मण जी ने बाण चलाया, जिससे जमीन से जलधारा निकली। बाद में यहां बावड़ी बनाई गई, जिसे बाणगंगा और लक्ष्मण बावड़ी के नाम से जाना जाता है। मंदिर के पूर्व दिशा में आज भी यह बावड़ी मौजूद है।
संतान की कामना से बनाते हैं उल्टा स्वास्तिक
पुजारी गणेश गुरु के अनुसार विशेष रूप से संतान प्राप्ति की कामना लेकर आने वाले श्रद्धालु मंदिर के पीछे भगवान की पीठ की ओर उल्टा स्वास्तिक बनाते हैं। मनोकामना पूरी होने के बाद श्रद्धालु दोबारा आकर सीधा स्वास्तिक बनाते हैं। कई भक्त रक्षा सूत्र भी बांधते हैं और मनोकामना पूरी होने पर उसे खोलने के लिए मंदिर आते हैं।
मनोकामना पूरी होने पर तुलादान
मंदिर परिसर में बड़ा तराजू भी रखा हुआ है। मनोकामना पूरी होने के बाद श्रद्धालु अनाज, लड्डू या अन्य प्रसाद से तुलादान करते हैं। कई परिवार संतान प्राप्ति के बाद बच्चे के वजन के बराबर लड्डुओं का तुलादान कर प्रसाद श्रद्धालुओं में बांटते हैं।
विवाह का लग्न भी चढ़ाने की परंपरा
चिंतामन गणेश मंदिर से मालवा की एक पुरानी परंपरा भी जुड़ी है। जिन परिवारों में विवाह होता है, वे विवाह का लग्न भगवान चिंतामन गणेश के चरणों में चढ़ाने आते हैं। विवाह के बाद नवदंपती दोबारा मंदिर पहुंचकर दर्शन करते हैं और लग्न भगवान के चरणों में छोड़ने की परंपरा निभाते हैं।
35 किलो चांदी से दमका गर्भगृह
मंदिर के गर्भगृह में चांदी की नक्काशी भी आकर्षण का केंद्र है। मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार एक गुप्त दानदाता ने करीब 35 किलो चांदी दान की। इसी चांदी से गर्भगृह की दीवारों पर आकर्षक डिजाइन और वर्क कराया गया है।
अहिल्याबाई के समय जीर्णाेद्धार की मान्यता
मंदिर के वर्तमान स्वरूप को करीब 250 साल पुराना माना जाता है। मान्यता है कि देवी अहिल्याबाई होलकर के समय मंदिर का पुनर्निर्माण या जीर्णाेद्धार कराया गया। मंदिर में परमार काल से जुड़े प्राचीन स्तंभ होने की बात भी कही जाती है। इस कारण मंदिर धार्मिक आस्था के साथ ऐतिहासिक महत्व भी रखता है।