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January 29, 2024, 8:44 pm
SPECIAL REPORT : दोस्ती की सुनहरी दास्तान और निकल गए प्राण, बता राजे हैं जनर्लिस्ट मुस्तफा हुसैन, पढ़े खबर 

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नीमच। केटीवी के मैनेजर महेंद्र शर्मा जी के पिताजी प्रहलाद जी शर्मा का 90 साल की उम्र में बीती 16 जनवरी को देहांत हो गया। महेंद्र जी मेरे पुराने दोस्त है और सेवानिवृत्त अध्यापक बेहद ही शानदार और शालीन व्यक्तित्व के धनी है।  

उनके पिताजी की मौत का सूचना मुझे जब मिली तो में भी शोक संवेदना व्यक्त करने उनके प्रगति नगर स्थित निवास पर पहुंचा। वहां महेंद्र भाई के पूरे परिवार से काफी बातचीत हुई। लेकिन इस दौरान एक ऐसी बात निकलकर सामने आई जिसे आप तक पहुंचाना ज़रूरी लगा। क्योंकि जब मुझे यह बात पता चली तो में भी हतप्रभ था और तब से अब तक यही सोच रहा हूं की गंगा-जमुनी तेहज़ीब का बिजवारा हम हिन्दुस्तानियो में इतने गहरे तक है की कोई भी ताकत इस भाईचारे को प्रलय होने तक तक खत्म नहीं कर सकती और ये दास्तान भी उसी भाईचारे की है।  

महेंद्र भाई के पिता 90 वर्ष के थे। बस यही बुजुर्गी उनकी बिमारी थी। वे अचानक 14 जनवरी को ज़्यादा बीमार हो गए। जब तबियत बिगड़ी तो उन्हें चौरड़िया जी के अस्पताल में भर्ती करवाया। जहां चिकित्स्कों के मशवरे के बाद यह बात सामने आयी की इन्हे घर ले जाकर इनकी सेवा की जाए। इस दौरान अस्पताल में वे दो दिन रुके और लगातार नयी पुरानी बात करते रहे और उनसे कई परिजन भी आकर मिले।  

इसी दौरान अस्पताल में उन्होंने महेंद्र जी से कहा कि ज़माना आ गया पर मेरा दोस्त बदरुद्दीन नहीं आया। बदरुद्दीन यानि बदरुद्दीन बाबर साहब जो शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त है और प्रहलाद जी की उम्र के आस पास के है। वे और प्रह्लाद जी काफी करीबी दोस्त रहे और दोनों का मिलना जुलना बरसो से जारी था, यानी बेहद ख़ास दोस्त। वैसे प्रहलाद जी इलेक्ट्रिशियन थे और इसी काम के दौरान इन दोनों की बरसो पहले दोस्ती हुई थी। 

प्रहलाद जी ने जब बाबर साहब की पूछा तो महेंद्र भाई ने कहा उन्हें पता नहीं चला होगा नहीं तो वे आ जाते। इसी बीच 16 जनवरी की शाम 5 बजे करीब प्रहलाद जी को हॉस्पिटल से छुट्टी दिलवाकर घर ले आये। जब उन्हें लेकर घर पहुंचे तो उसी समय गेट पर बाबर साहब पहुंचे और बोले की में दो दिन से आने की सोच रहा था पर कोई लाने वाला नहीं था। इसी दौरान प्रहलाद जी को घर के अंदर ले जाकर लिटाया। घर में पहुंचकर महेंद्र भाई ने कहा पापा अब तो बाबर साहब भी आ गए। इस पर प्रहलाद जी ने पूछा कहां है बदरुद्दीन ?

इस पर महेंद्र भाई ने कहा यहीं बैठे हैं और बाबर साहब का हाथ अपने पिताजी के हाथ में दिया। जैसे ही प्रहलाद जी ने अपना हाथ अपने दोस्त के हाथ पर रखा और बोला आ गए तुम और इतना बोलते ही उनके प्राण पखेरू उड़ गए और इस तरह प्रहलाद जी ने अपने अज़ीज़ दोस्त के हाथ पर अपने प्राण त्याग दिए। ऐसा लगा दो दिनों तक वे ज़िंदा इसीलिए थे की उनका दोस्त उनसे नहीं मिला था, और जैसे ही वो मिले बेहद इत्मीनान से वो परमपिता परमेश्वर के पास चले गए। 

मुझे दोस्ती की ये सुनहरी दास्तान जब महेंद्र भाई ने बताई तो मुझे लगा इसे आप तक पहुंचाना चाहिए। क्योकि आपा धापी के इस दौर ऐसी कई बाते जो समाज को दिशा देने वाली है अखबार के पन्नो से दूर रह जाती है। भले ही आज साम्प्रदायिकता अपना फन फैला रही हो। पर प्रहलाद और बदरुद्दीन जैसे रिश्ते भारतीय समाज को जोड़े हुए है और हमारी कोशिश होनी चाहिए की जो चिराग ऐसे लोगो ने रोशन किया हुआ है हम उसे बुझने न दे, यही विनय, जय हिन्द-जय भारत। 

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