नीमच। सेवा कोई सहायता का रूप नहीं है यह मन का समर्पण है, हम होते ही कौन है कि किसी के लिए कुछ करने वाले? परमात्मा का दिया हुआ है तो इसी के ऊपर ही आधारित करते हैं अपने मन को जब यह समझ लेते हैं कि परमात्मा ने बल दिया है तो इस बल का सदुपयोग ही होना चाहिए। मन को परमात्मा के साथ जितना ज्यादा जोड़ेंगे उतना ही मन पवित्र होगा क्योंकि यह निराकार इस मन में बसेगा। यह बात निरंकारी मिशन दिल्ली के उपाध्यक्ष शांतिदूत सत गुरु राजवासदेव जी ने कही। वे सद्गुरु माता सुदीक्षा पूज्य महाराज जी के मार्ग दिशा निर्देशन में समीपवृती ग्राम मालखेड़ा स्थित नवनिर्मित संत निरंकारी सत्संग भवन के लोकार्पण शुभारंभ के पावन अवसर पर रविवार शाम 5 बजे आयोजित संत समागम के मध्य बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि सेवा के अनेक रूप है जहां हर कोई सेवा के साथ जुड़कर अपने अहंकार को त्याग सकता है। समर्पण से सुकून की बात को हम गहराई से देखें कि सुकून किस चीज से जुड़ा है तो वहां धन्यवाद की बात भी होती है। मन में धन्यवाद का भाव है कि जीवन में हमारे लिए परमात्मा ने इतनी सुंदर सृष्टि की रचना की है तो हमारा कर्तव्य है कि इंसान बनकर आए हैं तो वाकई ही इंसानों वाले गुणों को भी अपनाना है। सिर्फ दिखावा मात्रा नहीं, अंदर से भी हमारा एक जो लक्षण हो वह इस आत्मा के साथ जोड़कर इंसानों वाला ही हो मानवीय गुणों से युक्त जीवन जहां हर कोई जी सकता है, वहीं इस परमात्मा को जानने के बाद फिर चाहे यह निर्गुण- निराकार है, फिर भी सारे ही गुण इसी में है जीवन में ऐसे ही गुणों से हम भी युक्त हो सकते हैं। ऐसे गुणों को हम सभी अपनाते चलें जाए। कोई भी परिस्थिति हो या तो शिकायत कर सकते हैं इस परमात्मा से या फिर उसे स्थिति में धन्यवाद का भाव रख सकते हैं। मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा यह भवन जहां संत रहे तो वह घर भी पवित्र हो जाता है जिस घर में निरंकार का ज्ञान आ जाए वह शरीर भी पवित्र हो जाता है ब्रह्म ज्ञानी का चरणामृत का महत्व बढ़ता है। सत्संग भवन में ब्रह्म ज्ञान मिलता है गुरु जहां बैठता है वह गुरुद्वारा बनता है। सत्संग भवन में प्रवेश करें तो दुनिया को भूलना चाहिए। सेवा तन मन धन से होनी चाहिए एकाग्रता पूर्वक संतसग सुनना चाहिए। ज्ञान वचन सुनते हैं तो इस जीवन में आत्मसात भी करना चाहिए। धर्म के दिखावे से बचना चाहिए।अयोध्या में मंदिर बना है पूजा पाठ हो रही है राम कण कण में व्याप्त है। समुद्र मंथन हुआ देवताओं राक्षसों में अमृत को लेकर युद्ध भी हुए। अमृत पीकर अमर होना चाहते थे देवता और दानव। संपत्ति रिश्ते परिवार की समस्या हो तो संतो के पास नहीं जाना चाहिए जो परमात्मा से डरते हैं। दुनिया उनसे डरती है। हमें विवेक का ज्ञान दिया है। सत्संग के मार्ग पर होशियारी दिखावा नहीं चलता है। यहां सत्य ही चलता है।सत्य हर युग में रहा है। हर युग में रहेगा। परमात्मा एक मजबूत किला है ।राम चारों तरफ है ।कृष्ण ने गीता में अर्जुन को उपदेश दिया था कि कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर, नमाज भी एक तरीका है। अल्लाह दिखता नहीं है फिर भी लोग उपासना करते हैं।इजराइल रूस यूक्रेन के युद्ध हुए हैं लेकिन एटम बम किसी ने नहीं छोड़ा सभी को तबाही का ज्ञान है। परमात्मा चोर डाकू सबको देता है। अभिमान किसी का नहीं रहता है। हम सेवक बनकर सेवा करें सबका भला करें यही परमात्मा से प्रार्थना करनी चाहिए। परमात्मा का मार्ग सबसे ऊंचा महान होता है। जिसके हृदय में परमात्मा रहते हैं वह महान हो जाता है। इस अवसर पर नन्ही 5 वर्षीय बालिका किंशिका व्यास ने मधुर करणप्रिय गीत प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर सद्गुरु का स्वागत मुखी पदम कुमार कोटक, एन आर शाक्य, संजय निरंकारी, राजकुमार निरंकारी रतलाम,अर्जुन सिंह पंवार, सेवादल इन्चार्ज सीएम व्यास, सुधीर व्यास समाजसेवी बालकृष्ण सोलंकी, जगमोहन कटारिया, गुणवंत गोयल, कन्हैयालाल मेघवंशी, माया बहन, गायत्री बहन, वर्षा बहन ने स्वागत सत्कार का आशीर्वाद ग्रहण किया। इस अवसर पर एक तू ही निरंकार मेरे अवगुण को ना स्वीकार सामूहिक गीत प्रस्तुत किया गया। नन्हे मुन्ने बच्चे शिवा, ग्रंथ, किंशिका के जन्मदिवस के पावन उपलक्ष्य में लंगर प्रसादी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर सभी श्रद्धालु भक्तों ने संत समागम के बाद भोजन कर अपनी थाली स्वयं साफ धोकर उचित स्थान पर रखी और अपने सेवा कर्तव्य का निर्वहन किया। सभी ने संत समागम में प्रवेश से पूर्व अपने-अपने जूते चप्पल पंक्ति में जमा कर अनुशासन का संदेश दिया।