चित्तौड़गढ़। राम स्नेही सम्प्रदाय के युवा संत एवं भागवत मर्मज्ञ दिग्विजयराम ने कहा कि कलयुग में मित्रता केवल नाम की रह गई। यह कारण हैं कि लोग मित्रता के बहाने एक दूसरे को ठगने का काम करते हैं। ऐसे में श्रीमद् भागवत महापुराण में वर्णित कृष्ण और सुदामा की मैत्री को जीवन में अंगीकार करना चाहिए, ताकि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन सफल हो सके। युवा संत रविवार को श्री कल्लाजी वेदपीठ एवं शोध संस्थान द्वारा कृषि उपज मण्डी परिसर निम्बाहेड़ा में वेद एवं गौ सेवार्थ आयोजित श्रीमद् भागवत कथा महोत्सव के सप्तम दिवस बसंत पंचमी के पावन अवसर पर व्यासपीठ से सुदामा चरित्र का विस्तार से बखान कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि संदीपनी आश्रम में मित्र बने सुदामा और कोई नहीं वरन त्रेतायुग के केवट और द्वापरयुग के मित्र सुदामा थे, जो अपनी दीनहीन दशा में पत्नी सुशीला के साथ सुदामा नगरी में निवास करते थे। जिनको समर्थ बनाने के लिए द्वारकाधीश स्वयं सुशीला के पास जाकर भिक्षु के रूप में भिक्षामदेही की पुकार लगाई, तब सुशीला ने कहा कि उनके पास केवल दरिद्रता हैं, तो प्रभु ने दान में वहीं स्वीकार कर ली और सुशीला भाभी से कहा कि अपने स्वामी को उनके बालसखा कृष्ण से मिलने द्वारिका भेजे। तब सुशीला ने आग्रह कर सुदामा को अपने बालसखा से मिलने के लिए प्रेरित किया और पड़ौसियों से एक मुठ्ठी तन्दुल फटे कपड़े में पौटली बांधकर अपने मित्र को देने का आग्रह किया। जब सुदामा अपने गांव से कुछ दूरी पर गए तो लोगों ने बताया कि खाड़ी पार करने के बाद द्वारिका आएगी, यह सुनकर थकेहारे सुदामा वहीं रात्रि विश्राम कर जब नाव में बैठे तो श्री कृष्ण स्वयं नाविक बनकर खाड़ी के बीच जाकर उनसे उतराई मांगी तो सुदामा ने कहा कि उनके पास देने को कुछ नहीं हैं, तब प्रभु ने केवट के भाव अनुरूप उसे नौका से पार कर द्वारिका नगरी पहुंचा दिया। जहां खड़े द्वारपालों से सुदामा ने द्वारिकाधीश के महल की जानकारी चाही तो उन्होंने कहा कि सामने महल हैं वहां किससे मिलना चाहते हो तब सुदामा ने अपने बालसखा कृष्ण से मिलने की बात कहीं। तब द्वारपालों ने द्वारिकाधीश से जाकर फटेहाल सुदामा की दीनदशा के साथ उनके आगमन की सूचना दी तो भगवान द्वारिकाधीश नंगे पैर द्वार पर जाकर बालसखा से लिपट गए और अपने साथ लाकर सिंहासन पर बैठाया, तब उन्होंने जल की परात को बिना हाथ लगाए अपने अश्रुओं से बालसखा के चरण धोकर संसार को अनूठे मैत्री भाव का संदेश दिया। यहां प्रभु से पोटली छूपाते देखकर उन्होंने जबरन पोटली छिननी चाही तो सुदामा के चावल बिखर गए। जिसमें से दो मुठ्ठी का भोग लगाने पर सुदामा को दो लोक का धनी बना दिया और तीसरी मुठ्ठी को रूकमणी ने रोक दिया। कुछ दिन द्वारिका नगरी में रहने के बाद जब सुदामा अपनी नगरी को लौटे तो सुदामा की झोपड़ी की जगह विशाल महल और सुशीला महारानी की रूप में देखकर दंग रह गए, तभी द्वारिकाधीश ने वहां आकर सपत्निक सुदामा को दर्शन देकर धन्य किया, तब सुदामा ने कहा कि उसे माया नहीं मायापति की चाह हैं इसलिए इस माया को समेट लो ताकि ये उसके भक्ति मार्ग से विलग्न ना कर सके, तब प्रभु ने कहा कि यह माया भक्ति मार्ग में बाधक नहीं होगी वरन प्रभु के प्रसाद रूप में विद्यमान रहेगी। इस संदर्भ से यह स्पष्ट होता हैं कि सुदामा के साथ नाम की संपदा थी। युवा संत ने सुखदेव मुनि द्वारा भागवत प्रसंग में दिए गए व्याख्यान के तहत कहा कि माँ देवकी ने अपने कन्हैया से कंस द्वारा मारे गए छह पुत्रों को प्राप्ति की प्रार्थना की तो द्वारिकाधीश ने उन्हें वरदान स्वरूप पुनरू छह पुत्र प्रदान कर दिए।
संत श्री ने सुभद्रा चरित्र के संदर्भ में बताया कि श्री कृष्ण ने अपनी बहन सुभद्रा का विवाह अर्जुन से कराने का निर्णय लिया, तब रूमकणी मंगल की तरह अर्जुन द्वारा सुभद्रा का अपहरण कराने पर विवाह किया गया। उन्होंने भस्मासूर वध के संदर्भ में कहा कि भगवान शिव से वरदान प्राप्त कर जब भस्मासूर उन्हें ही भस्म करने का जतन करने लगा तो नारायण ने मोहिनी रूप धारण कर नृत्य करते हुए भस्मासूर का हाथ खूद के ही सिर पर ले जाने पर वह स्वयं ही भस्मीभूत हो गया। उन्होंने भृगु ऋषि द्वारा तीनों देवों की परीक्षा के संदर्भ में बताया कि जब ऋषि ने नारायण के वक्ष पर लात मार दी तो नारायण ने कहा कि हे ऋषि मेरे व्रजरूपी वक्ष से कई आपके चरणों में चोंट तो नहीं लगी यह सुनकर भृगु ऋषि ने नारायण को सर्वश्रेष्ठ देव घोषित कर दिया। संत श्री ने कहा कि अन्तर्मन से प्रभु का स्मरण करने से ही लोक और परलोक सुधर जाता हैं।
उन्होंने यदुवंश के नाश के प्रसंग में बताया कि ऋषि के श्राप से यदुवंशों की गर्भवती स्त्री के पेट से मूषल निकला, जिसको समुद्र के किनारे फैंकने पर ऐरक नामक घास पैदा हुई। जिसके तीनको से यदुवंशी एक दूसरे से लड़ झगड़ के मारे गए। उन्होंने श्री कृष्ण के स्वलोकधाम गमन की चर्चा में कहा कि बालि को छिपकर मारने की कथा के अनुरूप प्रभु लीला से एक बहैलिया द्वारा एक वृक्ष के नीचे विश्रामरत श्री कृष्ण के पैर में तीर लगने के बहाने द्वारिकाधीश स्वलोकधाम सिधार गए। उन्होंने बताया कि राजा शुकदेव मुनि ने भागवत के सप्तम दिवस राजा परिक्षित के मोक्ष का वर्णन किया। जिसमें बताया गया कि शुकदेव मुनि ने भक्ति ज्ञान देने के बाद जब वहां से गमन किया तो तक्षक नाग ने आकर राजा परिक्षित को डस लिया और वे गौलोकधाम को गमन कर गए। प्रारंभ में वेदपीठ के न्यायसियों द्वारा व्यासपीठ का पूजन करने के साथ ही वेदपीठ से जुड़े वीर वीरांगनाओं ने द्वारिकापूरी निर्मित कथा मंडप में व्यासपीठ पर विराजित युवा संत को शास्त्र के साथ शस्त्र भेंटकर आत्मिक स्वागत अभिनन्दन किया। वहीं व्यासपीठ की ओर से सभी वीर वीरांगनाओं को केसरिया बाने में देखकर शक्ति का प्रतीक बताते हुए ऊपरना ओढ़ाकर उनका सम्मान किया। कथा के दौरान धरोहर एवं प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष सुरेन्द्र सिंह जाड़ावत, सुरेन्द्र नाथ योगी, बालमुकुंद मालीवाल सहित अन्य अतिथियों ने व्यासपीठ से युवा संत एवं संत रमताराम का आशीर्वाद लिया। कथा के दौरान कृष्ण सुदामा की झांकी दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र रही । वहीं कथा विश्राम से पूर्व बसंत पंचमी के पावन अवसर पर भव्य बसंतोत्सव फूलों की होली के रूप में मनाया गया। जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल हुए।
इस बीच युवा संत ने हजारों श्रद्धालुओं को गौ माता को राष्ट्र गौ माता बनाने का संकल्प दिलाने के साथ ही व्यसन छोड़ने का भी संकल्प कराया। युवा संत के भजन होली तो कान्हा कल्याण नगरी में आओ जी पर सतरंगी फूलों के फाग से ब्रज की होली का दृश्य निरूपित हो गया। कथा विश्राम पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने व्यासपीठ की महाआरती की। बसंत पंचमी के पावन अवसर पर वेदपीठ पर विराजित ठाकुर श्री कल्लाजी सहित पंचदेवों का मनभावन श्रृंगार भक्तों के लिए आकर्षण केन्द्र रहा।