चित्तौड़गढ़। श्रमणसंघीय आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनिजी म. के आज्ञानुवर्ती प्रवर्तक गुरुदेव रमेशमुनि जी म. के सुशिष्य श्रमणसंघीय मंत्री गौ प्रेमी क्रांतिकारी राष्ट्रसंत कमलमुनि कमलेश 13 फरवरी 2025 को अपने जीवन के 69 वें वर्ष में प्रवेश पूर्ण करेंगे।
राजस्थान के चित्तोड़गढ़ जिलान्तर्गत डूंगला में 13 फरवरी 1957 में गुलाबचन्द मनोहरबाई के घर-आँगन में जन्मे कोमलचन्द नागौरी से कमलमुनि बन गये राष्ट्रसंत एक ऐसे संत रत्न है, जिन्होंने जीवदया के क्षेत्र में अपना पूर्ण समर्पण प्रदान कर देशभर में जगह-जगह सैकड़ों गौशालाएँ खुलवाई। इनके मन में गौशालाएँ खुलवाने का एक ऐसा जुनून सा बन गया कि जेलों में भी गौशालाएँ खुलाकर एक और जीवदया के प्रति केदियों का मन मोड़ा, साथ ही उन्हें अपराधमुक्त बनाने के लिए जबरदस्त प्रेरणा दी, उनकी पढ़ाई के बन्दोबस्त किए एवं सामान्य नागरिक की भाँति उत्कृष्ट जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। देश को अपराध मुक्त बनाने में अपने आप में यह एक बहुत बड़ा कदम साबित हुआ।
कई जगह पाठ्यशालाएँ, वृद्धाश्रम, संतजनों के वृद्धावस्था में स्थिरवास के लिए आवास, चिकित्सा, गरीबों के लिए अन्नदान आदि के ऐसे कार्य किए कि देशभर में आपके प्रति श्रद्धा बढ़ती गई। जगह-जगह श्रद्धालु आपके भक्त बन गये। सम्मान सत्कार के लिए भक्तजन पलक पावड़े बिछाने लग गये। और तो और देश के 18 प्रान्तों की सरकारों ने आपको राजकीय अतिथि का दर्जा प्रदान कर दिया, जो श्रमण संघ के लिए ही नहीं, सम्पूर्ण जैन जगत के लिए गौरव व गरिमा का विषय है। यहाँ यह बताना प्रासंगिक होगा कि मेवाड़ सिंहणी सद्गुरूवर्या यशकँवर जी म. एवं कोशल्या कंवर जी म. ने राष्ट्रसंत के जन्मस्थल डूंगला में संयुक्त चातुर्मास किया था। तब उनके प्रवचनों से कोमलचन्द में वैराग्य के अंकुर प्रस्फुटित होने लगे। भावना इस तेजी से बदली कि वे कठोर साधना करने लगे एवं माता से दीक्षा की आज्ञा माँग ली। अचानक दीक्षा की बात सुनकर माँ काफी चिन्तित हो उठी। घबराये मन से माता ने कहा कि बेटा। तुम्हारे पिताश्री देवलोक हो चुके हैं। बड़े भाई सरकारी नोकरी में है। तुमने यह कदम उठाया तो फिर घर-परिवार को कौन संभालेगा? कोमल ने अपने कोमल मन से ही माताश्री को खूब समझाया किन्तु माँ नहीं मानी तब काफी जद्दोजहद के बाद कोमल ने स्पष्ट कहा कि जब तक मुझे दीक्षा की आज्ञा नहीं दोगे, मैं आडा आसन नहीं करूँगा। इसके साथ ही आज्ञा न देने तक मीठे का त्याग सहित कठोर अभिग्रह ले लिया। दीपावली पर श्मसानभूमि में जाकर साधना की। वैराग्य की प्रबलता के आगे बेबस माताश्री ने आज्ञा दी तब आपने गुरू के चयन तक एक वर्ष के लिए ब्यावर स्थित जैन दिवाकर छात्रावास में संस्कृत, प्राकृत आदि विषयों सहित जैनागमों का गहन अध्ययन किया। स्वाध्यायी बनकर प्रवचन भी दिए। इसी दौरान पश्चिम भारतीय प्रवर्तक गुरूदेव रमेशमुनिजी म. की सरलता, विनम्रता, विद्वता से प्रभावित होकर 22 अप्रैल 1980 को वैसाख शुक्ला अष्टमी पर डूंगला में मेवाड़ गौरव प्रतापमल जी म. के सानिध्य में दीक्षा ग्रहण कर ली। वर्षीतप का प्रसंग भी साथ में था, करीब 40 संत-साध्वियों सहित हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति थी।
दीक्षा के बाद आपको कमलमुनि का नाम दिया गया। अब कोमलचन्द कमलमुनि बनकर जैनागमों के अध्ययन को आगे बढ़ाने में लग गये तथा करीब 4 वर्ष तक गहन अध्ययन के साथ-साथ जैन सिद्धान्ताचार्य की परीक्षा पास की। अपनी सरलता, विनम्रता, विनयशीलता, मिलनसारिता, दूरदर्शिता व विवेक से समाज सहित संत-साध्वियों पर आपने गहरा प्रभाव जमाया तथा इन्हीं गुणों की बदौलत दीक्षा के मात्र 5 वर्ष बाद हो गुरुदेव ने आपको अलग से स्वतन्त्र चातुर्मास करने की आज्ञा प्रदान कर दी। उस समय वीरवाल प्रवृत्ति को हाथ में लेकर रामपुरा में चातुर्मास किया, जो ऐतिहासिक सिद्ध हुआ। शासन-प्रशासन को प्रेरित करके ग्राम प्रधानों को गौशाला खोलने के लिए तैयार किया। सेण्ट्रल जेलों में जाकर लोगों को अपराध मुक्त करने के प्रबल प्रयास किए। जेलों में गौशालाएँ खुलवाई। आतंकवाद व नक्सलवाद को समाप्त करने हेतु उनके बीच जाकर अहिंसा की अलख जगाई। कश्मीर से कन्याकुमारी तक तथा देश के विभिन्न प्रान्तों सहित नेपाल आदि देशों में पैदल विहार कर धर्म जागृति फैलाने वाले कमलमुनि जी म. ने सभी धर्म पंथ के धर्मगुरूओं से मिलकर गहन विचार विमर्श किए। इतना सब होते हुए भी आप सदैव पदमोह से दूर रहे। फिर भी अनेकानेक पदवियों से विभूषित होते ही रहे। देश में राष्ट्रीय मुश्लिम अहिंसा मंच का गठन कर नवीन क्रांति का सूत्रपात किया। आपकी ही प्रेरणा से बड़ी संख्या में मुस्लिमबन्धु गौरक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं।
श्रमणसंघ में मंत्री पद को सुशोभित करते हुए अपने इन्द्रधनुषी व्यक्तित्व से श्रमण संघ की शोभा में अभिवृद्धी कर रहे हैं। अपने जन्म स्थल डूंगला में जैन दिवाकर कमल तीर्थ की स्थापना की है, जिसमें पशु-पक्षी की सेवा कार्य के अलावा वृद्ध व अस्वस्थ संत-साध्वियों के आवास की व्यवस्था कर संघ में भी एक उदाहरण प्रस्तुत किया है।
विगत वर्ष ही आपने विधवा महिलाओं को हीन भावों से मुक्त करने का संकल्प लेकर प्रभावी प्रेरणाएँ दी एवं उन्हें श्वीरांगनाश् का दर्जा दिलाते हुए उनमें नवीन उत्साह, उमंग व साहस भरने का सफल प्रयास किया है, उसकी सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। गुरूदेव से हमारा करीब 37 वर्षों से सम्पर्क रहा है।
आलेख की लेखिका के विचार -
प्रस्तुत आलेख की जानकारी देते हुए जैन दिवाकर विचार मंच (महिला शाखा) की राष्ट्रीय मंत्री मधु संचेती बीगोद बताती है कि
आपकी ही प्रेरणा से 13 मई 2014 की मैंने आपके सानिध्य में बीगोद स्थित मेरी संचेती वाटिका में विश्व शांति के उद्देश्य से श्महामंत्र जाप अनुष्ठानश् कार्यक्रम किया था, जिसमें बड़ी संख्या में समाजसेवियों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों ने भाग लिया था, उस समय आपने क्षेत्र में प्रभावी विचरण किया था। इसको बाद मार्च 2023 की शुरूआत में आपने भीलवाड़ा के बाद कोटड़ी, नन्दराय, बीगोद, माण्डलगढ़, लाडपुरा, भीचौर, पारसोली, काटून्दा, बेगूँ, कदवासा, सिंगोली (म.प्र.), कास्या आदि अनेकों स्थानों पर पहुँचकर धर्म की अभूतपूर्व प्रभावना की। अधिकांश कार्यक्रमों में परिवार सहित मैंने भी सिरकत की, इस दौरान भी मैने आपके व्यक्तित्व कृतित्व को निकटता से देखा। आप जहाँ भी रूके, वहाँ गौशाला, पक्षी विहार, भवन निर्माण सहित प्राणी जगत की रक्षा, सुरक्षा व मानवतावादी कार्यों की प्रेरणा करते रहे एवं सभी स्थानों पर आपकी प्रेरणाओं ने साकार रूप लिया, यह आपके प्रभावी व्यक्तित्व की स्पष्ट निशानी रही। आपकी प्रेरणा एवं आशीर्वाद से मैंने अखिल भारतवर्षीय जैन दिवाकर विचार मंच (रजि.) नई दिल्ली की महिला शाखा के राष्ट्रीय मंत्री पद का भार ग्रहण कर रखा है। मेरे जीवन साथी दिनकर संदेश के प्रधान सम्पादक समाजरत्न दिनेश संचेती श्दिनकरश् के सहयोग से मैं उस पद के दायित्वों का निर्वहन करते हुए आपके विचारों एवं सेवा के संकल्पों को आम जनमानस तक ले जाने का विनयपूर्वक प्रयास कर रही हूँ। हाल ही में आपकी हो सप्रेरणा से मध्यप्रदेश की सीमा से सटे राजस्थान के चित्तोड़गढ़ जिलान्तर्गत धांगड़मऊ में 25 जनवरी 2025 को मेरी उपस्थिति में श्री महावीर कृष्ण गौशालाष् की स्थापना की गई है, जिसको धर्मरत्ना सुश्री आभा गांधी नवीन ऊँचाईयाँ देने में कृतसंकल्पित हो कार्य कर रही है, उसमें भी आपकी ही प्रेरणा से मुख्य बस स्टेण्ड पर 8 बीगा क्षेत्र में कार्य शुरू हो चुका है। आपका वर्ष 2024 का मुम्बई वर्षावास भी ऐतिहासिक उपलब्धियों से परिपूर्ण रहा तथा अब 2025 का चातुर्मास चेन्नई में करने का मानस लेकर दक्षिण भारत में धर्मप्रभावना के लिए कूच किया है। दरअसल ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने आपको विशेष गुण गौरव एवं सद्संस्कारों से विभूषित करके जनकल्याणार्थ गढ़ा हो। निश्चित हो आप गुरू होने के साथ-साथ मानवता के मसीहा जैसे हैं ये सारी ऊँचाईयाँ प्राप्त करने में आपको कई बार विरोधाभास भी झेलना पड़ा किन्तु उन सबसे तनिक मात्र भी विचलित नहीं हुए। मैंने उनसे कई बार चर्चा-वार्ता भी की तो वे बोले कोई भी विष घोले, मैं तो अमृत पिलाऊँगा। यह उनके जीवन का यथार्थ दर्शन भी रहा सह अस्तित्व, सहिष्णुता, समता जैसे गुण से लोगों का दिल जीता तथा आज इसी वजह से जहाँ भी जाओ, श्रद्धालुओं की कतारें लगी दिखाई देती है, तब सहज ही लगने लगता है कि जन्म लेना एक सामान्य बात है, किन्तु गुण सम्पन्न जीवन जीना विशेष बात होती है, जो व्यक्ति संयम और परोपकार का जीवन जीता है, वह स्वयं धन्य बन जाता है। ऐसी आत्माएँ असाधारण होती है, यही असाधारणता आपमें भरी पड़ी है। निश्चित ही आपका जीवन अलौकिक, दिव्य, अनुपम व श्रेष्ठ है। व्याख्यान वाचस्पति, वीरवालोद्धारक, राष्ट्रसंत, पंजाबरत्न, अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा सेनानी, जगतगुरू, अहिंसा दिवाकर जैसी अनेक पदवियाँ आपको प्राप्त हुई है।
धर्मप्रभावना के साथ-साथ गौरक्षा एवं गौसेवा के क्षेत्र में क्रांति मचा देने वाले राष्ट्रसंत ने फक्कड़ अंदाज में व्यसनमुक्ति संस्कार निर्माण हेतु शिक्षा के लिए विद्यालयों की प्रेरणा, चिकित्सा, मानव सेवा के कार्यों को कुछ इस तरह अंजाम दिया है कि लाभान्वित होने वाले ही नहीं, सुनने वाले भी धन्य धन्य कह उठते हैं। राष्ट्रसंत के कार्यों की यह मात्र एक बानगी है, यदि सभी कार्य उल्लेखित किए जायें तो हर कोई दाँतों तले अंगुली दबाने को विवश हो जायेगा।
जीवन के 68 बसन्त की पूर्णता एवं 69 वें वर्ष में प्रवेश पर वीर प्रभु से यही प्रार्थना है कि आप दीर्घ काल तक निरोगी रहते हुए इसी भाँति धर्म प्रेरणा के साथ सेवा के सौपान में नित नई गति-प्रगति करते रहें। हर क्षेत्र में सफलता के सुमनों की माला आपको मिलती रहे। जिनेश्वर देव आपको दीर्घ आयु प्रदान करें। आप वे ऊँचाईयाँ प्राप्त करें, जो आज तक कोई न कर पाया हो।