BREAKING NEWS
KHABAR : भारतीय जनसंघ के दौर से निष्ठावान सेवा का.. <<     KHABAR : श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में.. <<     KHABAR : सीएम हेल्पलाइन की 50 दिन से अधिक लंबित.. <<     KHABAR : श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में.. <<     KHABAR : गुर्जर समाज के विकास और एकता को लेकर अहम.. <<     BIG NEWS : मोहन कैबिनेट के बड़े फैसले, 21 साल बाद एमपी.. <<     BIG NEWS : पीआईसी सदस्यों ने 15 करोड़ से अधिक के विकास.. <<     KHABAR : किसानों की समस्याओं को लेकर भारतीय किसान.. <<     KHABAR : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस पर.. <<     BIG NEWS : निर्माणाधीन मकान में चोरी का खुलासा, दो.. <<     KHABAR : जनसुनवाई में कलेक्टर ने सुनी नागरिकों की.. <<     KHABAR : राष्ट्रीय पोषण माह के तहत पोषण एवं.. <<     NEWS : मादक पदार्थ तस्करी में जब्त 31 वाहनों की.. <<     KHABAR : कृति संस्था का हिंदी दिवस पर ‘राम कथा में.. <<     KHABAR : कलेक्टर चंद्रा ने जनसुनवाई में सुनी 65.. <<     KHABAR : आम रास्ते पर अतिक्रमण से स्कूल जाने वाला.. <<    
वॉइस ऑफ़ एमपी न्यूज़ चैनल में विज्ञापन के लिए..
September 10, 2026, 4:17 pm
NEWS : परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन अपने भावों को स्थिर रखें, धर्मसभाा में अभिनव मुनि ने कहा- आत्मा का सुख ही स्थायी है, आसक्ति ही दुखों का कारण है, पढ़े रेखा खाबिया की खबर 

Share On:-

चित्तौड़गढ़। गांधीनगर स्थित नानू नवकार भवन में धर्मसभा को संबोधित करते हुए अभिनव मुनि ने कहा कि संसार में भक्त और संत दोनों का महत्व है। भगवान कृष्ण ने जिस प्रकार सुदामा का आतिथ्य किया, उसी भावना से सेवा और समर्पण का भाव रखें तो जीवन भवसागर से पार लगाने वाला बन सकता है। उन्होंने कहा कि परिस्थितियां परिवर्तनशील होती हैं, लेकिन व्यक्ति को अपने भावों में परिवर्तन नहीं आने देना चाहिए।

अभिनव मुनि ने कहा कि मनुष्य अनादिकाल से अठारह पापों में रमण करता आ रहा है, इसलिए इनसे मुक्त होने का लक्ष्य रखना चाहिए। पांच इंद्रियां आसक्ति को बढ़ाती हैं और यही आसक्ति दुख का कारण बनती है। संसार के सुख आभासी हैं, जबकि आत्मा का सुख ही स्थायी है। उन्होंने कहा कि किसी के प्रति द्वेष का भाव नहीं रखना चाहिए और मनुष्य जीवन सेवा के लिए मिला है।

उन्होंने कहा कि दूसरों की निंदा करने से कर्म बंधते हैं, जबकि स्वनिंदा से कर्मों का क्षय होता है। दुख से मित्रता कर लेने पर उसका प्रभाव कम महसूस होता है। दूसरों को सुख देने का प्रयास करेंगे तो स्वयं भी सुख प्राप्त होगा। उन्होंने गजसुकुमाल के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि अनेक भवों के बाद भी कर्मों का उदय अपना परिणाम लेकर आता है। धन के प्रति अत्यधिक आसक्ति भी दुख का कारण बन सकती है। मनुष्य जीवन में पूर्व कर्मों का त्याग करते हुए क्रियाओं को रोककर संवर और संयम के मार्ग पर बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।

इससे पूर्व दिव्यम मुनि ने अंतकृद्दशा सूत्र में गजसुकुमाल का वृतांत सुनाया। उन्होंने कहा कि जैसे कर्म किए जाते हैं, वैसा ही फल प्राप्त होता है। कर्म सिद्धांत में प्रत्येक कर्म का हिसाब है और कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। उन्होंने कहा कि सत्ता चार प्रकार की मानी गई हैकृराजसत्ता, अर्थसत्ता, धर्मसत्ता और कर्मसत्ता। कर्मसत्ता के उदय के अनुसार ही परिणाम सामने आते हैं। सुख-दुख में समभाव रखने वाला व्यक्ति ही जीवन की बाजी जीतता है।

अंत में मुनिश्री ने प्रत्याख्यान कराया और मांगलिक पाठ सुनाया। धर्मसभा का संचालन पारसमल सोनी ने किया।
 

VOICE OF MP
एडिटर की चुनी हुई ख़बरें आपके लिए
SUBSCRIBE