चित्तौड़गढ़। स्थानीय गांधीनगर स्थित समता भवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए महासती पूर्वीश्री ने कहा कि ब्रह्मचर्य की शक्ति अपार होती है। ब्रह्मचर्य से स्वास्थ्य अच्छा रहता है और स्मरण शक्ति भी प्रबल होती है। शास्त्रों में भी ब्रह्मचर्य का विशेष महत्व बताया गया है। इसके पालन से व्यक्ति के व्यक्तित्व में अपार तेज दिखाई देता है।
उन्होंने स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देते हुए कहा कि पुस्तकों के अध्ययन के बाद यदि उनसे कोई पूछता था कि अमुक विषय किस पुस्तक में है, तो वे अपनी अच्छी स्मरण शक्ति के कारण तुरंत बता देते थे कि वह विषय किस पुस्तक में और किस स्थान पर है। उन्होंने कहा कि ब्रह्मचर्य की शक्ति के आगे देव और दानव भी शीश नवाते हैं। इसके प्रभाव से आसपास के पुद्गल भी परिवर्तित हो जाते हैं।
महासती ने कहा कि ब्रह्म में रहने का अर्थ आत्मा में रमण करना है। इंद्रिय विषयों के प्रति गहरी उदासीनता होना ही संयमित जीवन की दिशा है। आत्मा सिद्ध स्वरूप है, उसका कोई वेद नहीं है। जीवन क्षणिक है, इस सत्य को समझते हुए जीवन के सिद्धांत निर्धारित करने होंगे। दृष्टि पर संयम रखना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में हाथ जोड़कर अभिवादन करने की परंपरा रही है, लेकिन आज आपत्तिजनक प्रदर्शन को आधुनिकता माना जाने लगा है। इससे बचने की आवश्यकता है। बाहरी वातावरण को भी शुद्ध रखना होगा। साधना और आराधना के मार्ग पर चलने के लिए उन्होंने विभिन्न मार्मिक उदाहरणों के माध्यम से प्रेरणा दी।
महासती पूर्वीश्री ने कहा कि रसयुक्त आहार से बचना चाहिए तथा वस्त्रों और वेशभूषा में शालीनता होना जरूरी है। वेशभूषा का व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। मुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने में वातावरण की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। संतों का सानिध्य मिलने से संयमित जीवन जीना आसान हो जाता है। इसके लिए जिनवाणी सुनने-समझने के साथ महापुरुषों के जीवनवृत्त का अध्ययन करना चाहिए।
उन्होंने लक्ष्मण का उदाहरण देते हुए बताया कि जब उनसे माता सीता के संबंध में पूछा गया तो उन्होंने कहा था कि वे केवल उनके पैरों की बिछिया के बारे में जानते हैं, क्योंकि माता सीता को प्रणाम करते समय उनकी दृष्टि पैरों तक ही जाती थी। इसके अलावा उन्हें उनके आभूषणों या अन्य अंगों के बारे में जानकारी नहीं थी। यह दृष्टि संयम और ब्रह्मचर्य जीवन का उत्कृष्ट उदाहरण है।
महासती ने कहा कि भगवान महावीर का शासन 21 हजार वर्ष तक चलेगा। वर्तमान समय में माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों के संस्कार और परवरिश पर ध्यान दिया जाए। मर्यादित जीवन जीने वाले माता-पिता अपनी संतान को लेकर अधिक निश्चिंत रह सकते हैं। शूरवीर और पराक्रमी महापुरुषों के माता-पिता के जीवन को भी समझना चाहिए।
उन्होंने सुमति मुनि एवं अनाकारश्रीजी म.सा. के जीवन के उदाहरण देते हुए ब्रह्मचर्य की शक्ति और संयम के महत्व को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि आज जिनशासन की भव्य प्रभावना हो रही है, इससे प्रेरणा लेकर जीवन में संयम को अपनाना चाहिए। जब भीतर ब्रह्म की दृष्टि जागृत होगी तो इच्छाओं से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा। मन में द्वंद्व की स्थिति हो तो निर्णय आत्मा की आवाज के अनुसार लेना चाहिए।
बच्चों को भय नहीं, संस्कार दें : महासती सुश्रिया
धर्मसभा को पूर्व में संबोधित करते हुए महासती सुश्रिया ने कहा कि आचार्य जवाहरलालजी के जीवन में अस्वस्थता के दौरान भी संयम पालन के प्रति सजगता रही। वे बाल्यकाल से ही मेधावी थे और कभी भयभीत नहीं रहते थे। उन्होंने प्रेरणा देते हुए कहा कि बच्चों को भयमुक्त वातावरण में संस्कारित करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बचपन में छोटी-छोटी बातों पर बच्चों को डराना उचित नहीं है। कई बार माता-पिता बच्चों से कहते हैं कि दूध पी लो, नहीं तो महाराज साहब या साधु-संतों के पास भेज देंगे। ऐसी बातों से बच्चे संतों को देखकर डरने लगते हैं। बच्चों के मन में संतों और धार्मिक जीवन के प्रति सम्मान एवं श्रद्धा का भाव विकसित करना चाहिए, भय का नहीं।
धर्मसभा में महासती शशांकश्री ने अंतगढ़ सूत्र का वाचन किया। नवीन पोखरना एवं शिल्पा पोखरना के छह उपवास के प्रत्याख्यान हुए। अंत में महासती ने मंगल पाठ सुनाया। संचालन शंकर सुराणा ने किया।