नीमच। अफीम नीति को लेकर नीमच के पूर्व विधायक डॉ. सम्पत स्वरूप जाजू ने अफीम उत्पादक क्षेत्र के सांसदों, किसान संगठनों और जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले एक दशक से अफीम उत्पादक किसानों को विभिन्न मांगों और वादों के नाम पर भ्रमित किया जा रहा है तथा अफीम नीति की घोषणा से पहले राजनीतिक लाभ लेने के लिए बयानबाजी की जाती है।
डॉ. जाजू ने कहा कि प्रत्येक वर्ष अफीम नीति की घोषणा से पहले जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और किसान संगठन अफीम सलाहकार समिति की बैठकों से लेकर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात तक करते हैं और कई मांगें सामने रखते हैं। उनका कहना है कि इनमें से कुछ प्रमुख मांगों का अफीम नीति से सीधे तौर पर कोई संबंध नहीं है।
एनडीपीएस एक्ट में संशोधन का मामला-
डॉ. जाजू ने कहा कि एनडीपीएस एक्ट की संबंधित धाराओं में संशोधन अथवा बदलाव का अधिकार संसद और केंद्र सरकार के स्तर पर है। उन्होंने सवाल उठाया कि अफीम उत्पादक क्षेत्र से लगातार चुने जा रहे सांसदों ने पिछले एक दशक में इस मुद्दे को कितनी बार संसद के समक्ष उठाया है।
उन्होंने अफीम उत्पादक क्षेत्र के सांसदों से मांग की कि वे इस संबंध में पिछले दस वर्षों की अपनी पहल और संसद में उठाए गए मुद्दों की जानकारी तथ्यों के साथ किसानों के सामने रखें।
अफीम और डोडा-चूरा के मूल्य को लेकर भी सवाल-
डॉ. जाजू ने अफीम और डोडा-चूरा के मूल्य में वृद्धि की मांग को लेकर भी सांसदों की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मूल्य निर्धारण का विषय संबंधित केंद्रीय विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है और इसका अफीम नीति से सीधा संबंध नहीं है।
उन्होंने दावा किया कि करीब दस वर्ष पहले अफीम के मूल्य निर्धारण को लेकर केंद्रीय राजस्व विभाग द्वारा एक समिति गठित की गई थी। समिति ने अफीम उत्पादन की परिस्थितियों का अध्ययन करने के बाद वर्ष 2016 में करीब 87 प्रतिशत मूल्य वृद्धि की सिफारिश की थी। डॉ. जाजू के अनुसार, इस सिफारिश पर अब तक अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई है।
उन्होंने कहा कि अफीम उत्पादक क्षेत्र के सांसदों को इस सिफारिश को संबंधित सक्षम स्तर पर गंभीरता से उठाकर किसानों को राहत दिलाने की पहल करनी चाहिए थी।
फसल बीमा में शामिल करने की मांग पर भी उठाया सवाल-
डॉ. जाजू ने अफीम की फसल को फसल बीमा योजना में शामिल करने की मांग को भी अफीम नीति से अलग विषय बताया। उन्होंने कहा कि फसल बीमा से संबंधित निर्णय केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के स्तर पर होता है।
उन्होंने कहा कि केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं किसान पृष्ठभूमि से आते हैं और अफीम उत्पादक किसानों की समस्याओं को समझते हैं। इसके बावजूद अफीम फसल को फसल बीमा योजना में शामिल कराने की दिशा में ठोस पहल नहीं होने का सवाल बना हुआ है।
‘उचित मंत्री के समक्ष मांगें रखें जनप्रतिनिधि’
डॉ. जाजू ने कहा कि अफीम उत्पादक क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों का दायित्व है कि वे किसानों की मांगों को संबंधित और सक्षम केंद्रीय मंत्रियों के समक्ष रखें तथा उनके निराकरण के लिए ठोस पहल करें। उन्होंने आरोप लगाया कि हर वर्ष अफीम नीति आने से पहले प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसे बयान दिए जाते हैं, जिनसे किसान भ्रमित होते हैं।
उन्होंने कहा कि किसानों को केवल घोषणाओं और बयानबाजी के बजाय संबंधित विभागों के स्तर पर की गई वास्तविक कार्रवाई और उसके परिणामों की जानकारी दी जानी चाहिए।