चित्तौड़गढ़। तेरापंथ भवन में पर्युषण पर्व विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक आयोजनों के साथ श्रद्धापूर्वक मनाया गया। पर्युषण पर्व को जैन धर्म में आत्मशुद्धि, संयम और साधना का महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। पर्व के प्रथम दिन खाद्य संयम दिवस के रूप में आयोजन किया गया। साथ ही चतुर्थ आचार्य श्री जीतमल के निर्वाण दिवस के रूप में भी इसे मनाया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान ऋषभदेव की चौबीसी की स्तुति के साथ हुआ। डीसा (गुजरात) से समाहित उपासिका सुधा बाफना एवं राजनगर (राजस्थान) से समाहित उपासिका श्रीमती रितु धोका की उपस्थिति में पर्युषण पर्व के विभिन्न दिवसों का आयोजन किया गया।
इस दौरान स्वाध्याय दिवस, सामायिक दिवस (अभिनव सामायिक का प्रयोग), वाणी संयम दिवस, अणुव्रत चेतना दिवस, जप दिवस एवं ध्यान दिवस मनाए गए। उपासिकाओं ने कालचक्र, भगवान ऋषभदेव, भगवान पार्श्वनाथ एवं भगवान महावीर के जीवन, पूर्व भव एवं साधना काल के साथ तेरापंथ के इतिहास, श्रावक-श्राविकाओं, गणधरों, प्रतिक्रमण, वंदना, बारह व्रत एवं कर्मवाद सहित विभिन्न विषयों की सरल एवं रोचक जानकारी दी।
दोपहर के सत्र में बहनों को तत्वज्ञान के साथ विभिन्न प्रस्तुतियों की तैयारी कराई गई। रात्रिकालीन कार्यक्रम में ज्ञानवर्धक एवं रोचक गतिविधियों के माध्यम से 24 तीर्थंकर, 16 महासतियां, नवकार महामंत्र एवं आचार्य प्रश्नोत्तरी का आयोजन किया गया। अर्हत् वंदना का भी आयोजन हुआ।
पर्युषण पर्व के दौरान विभिन्न तप एवं त्याग की आराधनाएं भी की गईं। इनमें एकासन, सिद्धि तप, 10 उपवास, अट्ठाई, उपवास, सामायिक पचरंगी, मौन पचरंगी, अष्टप्रहरी पौषध एवं चार प्रहरी पौषध सहित अन्य साधनाएं शामिल रहीं।
भगवती संवत्सरी का कार्यक्रम सुबह 9 बजे से दोपहर 1 बजे तक आयोजित हुआ। इसमें उपासिकाओं ने भगवान महावीर के सर्वज्ञता काल, तेरापंथ की आचार्य परंपरा, तेरापंथ की मौलिक मर्यादाओं, सिद्धांतों एवं प्रभावक आचार्यों के बारे में सरल ढंग से जानकारी दी। महिला मंडल की ओर से भी विभिन्न प्रस्तुतियां दी गईं।
कार्यक्रम का समापन संघ गान के साथ हुआ। संवत्सरी प्रतिक्रमण सामूहिक रूप से किया गया। इसके बाद मैत्री दिवस का आयोजन भी सामूहिक रूप से हुआ तथा पारणे की व्यवस्था भी सामूहिक रूप से रखी गई।