मंदसौर। अफीम की खेती करने वाले किसानों की नजर अब नई अफीम नीति पर टिकी है। पिछले वर्ष 11 सितंबर को नीति जारी हो चुकी थी, लेकिन इस बार 2026-27 की नीति का इंतजार लंबा होता जा रहा है। नीति जारी होने में देरी के बीच किसानों ने भी अपनी मांगों को लेकर मोर्चा संभाल लिया है। मंदसौर में अफीम किसानों और किसान पुत्रों ने जिला कलेक्टर के माध्यम से सरकार के नाम 8 सूत्रीय ज्ञापन सौंपकर अफीम का भाव एक लाख रुपए प्रति किलो करने, पुराने पट्टे बहाल करने, अधिक किसानों को लाइसेंस देने और सीपीएस पद्धति समाप्त करने सहित कई मांगें उठाईं। किसानों ने स्पष्ट किया कि नई नीति में उनकी मांगों को शामिल कर पारंपरिक अफीम खेती से जुड़े किसानों को राहत दी जाए।
पिछले साल 11 सितंबर को जारी हुई थी नीति-
किसानों ने इस बार अफीम नीति जारी होने में हो रही देरी का मुद्दा भी उठाया। किसानों के अनुसार, पिछले वर्ष 2025-26 की अफीम नीति 11 सितंबर को जारी कर दी गई थी, जबकि इस वर्ष अभी तक 2026-27 की नीति जारी नहीं हुई है। किसानों ने मांग की है कि नीति जल्द जारी कर उसमें उनकी मांगों को शामिल किया जाए, ताकि अफीम उत्पादक किसानों के सामने स्थिति स्पष्ट हो सके।
अफीम का मूल्य एक लाख रुपए प्रति किलो करने की मांग-
ज्ञापन में किसानों ने अफीम का मूल्य अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुरूप एक लाख रुपए प्रति किलोग्राम निर्धारित करने की मांग की है। साथ ही वर्ष 1990 से निरस्त किए गए अफीम पट्टों को लुवाई-चिराई पद्धति के तहत बहाल करने और वर्ष 2008 से अफीम खेती का इंतजार कर रहे किसानों को खेती का अवसर देने की मांग की गई है। किसानों ने अफीम में मार्फिन की मात्रा को प्रकृति पर निर्भर बताते हुए 3 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के आधार पर अफीम पट्टे जारी करने की मांग रखी है।
राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार नामांतरण की मांग-
ज्ञापन में कहा गया कि पारिवारिक विवादों और आपसी मनमुटाव को रोकने के लिए राजस्व रिकॉर्ड के अनुरूप परिवार के सभी भाइयों के नाम से नामांतरण दर्ज किया जाना चाहिए।
डोडा-चूरा को लेकर नियम में बदलाव की मांग-
किसानों ने एनडीपीएस एक्ट की धारा 8/29 में बदलाव करने तथा डोडा-चूरा को एनडीपीएस एक्ट के दायरे से अलग करने की मांग की है। किसानों का कहना है कि डोडा-चूरा पोस्त का भूसा है। उन्होंने डोडा-चूरा की सरकारी खरीद की व्यवस्था बनाने की मांग भी रखी। ज्ञापन में इसका मूल्य 2 हजार रुपए प्रति किलोग्राम निर्धारित कर सरकारी खरीदी करने तथा इसके निस्तारण अथवा आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण में उपयोग का सुझाव दिया गया है।
सीपीएस पद्धति समाप्त करने की मांग-
किसानों ने सीपीएस पद्धति को पूरी तरह समाप्त कर पारंपरिक लुवाई-चिराई पद्धति के तहत अफीम खेती के पट्टे जारी करने की मांग की। किसानों का कहना है कि इससे पारंपरिक अफीम खेती को बढ़ावा मिलेगा और अधिक किसानों को खेती का अवसर मिल सकेगा।
2015 से 2026 तक की कार्यप्रणाली की जांच की मांग-
ज्ञापन में किसानों ने वर्ष 2015 से 2026 तक नारकोटिक्स विभाग की कार्यप्रणाली की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग भी रखी। किसानों ने विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने और यदि आरोप सही पाए जाएं तो कार्रवाई की मांग की।
मांगें नहीं मानी तो आंदोलन की चेतावनी-
किसानों ने चेतावनी दी कि यदि अफीम खेती नीति 2026-27 में उनकी मांगों पर उचित निर्णय नहीं लिया गया तो वे आंदोलन का रास्ता अपना सकते हैं। ज्ञापन में इसकी जिम्मेदारी सरकार, प्रशासन और नारकोटिक्स विभाग की होने की बात कही गई है।
चित्तौड़गढ़ में मिले आश्वासन का किया उल्लेख-
ज्ञापन में किसानों ने 24 नवंबर 2013 को चित्तौड़गढ़ में तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व द्वारा दिए गए आश्वासन का उल्लेख करते हुए परंपरागत अफीम खेती को बचाने के लिए किसानों को पट्टे देने और उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय लेने की अपील की। अंत में किसानों ने “जय किसान, जय भारत, जय संविधान, जय विज्ञान” का नारा दिया।