चित्तौड़गढ़। गांधीनगर स्थित नानू नवकार भवन में चातुर्मासिक प्रवचन करते हुए शांतक्रांति संघ की विदूषी महासती शीलप्रभा ने कहा कि ज्ञानियों के अनुसार इच्छाएं और तृष्णा आकाश के समान अनंत है और संसार में लोभ का भी कोई पार नहीं है। ज्यों ज्यों लाभ बढ़ता है, इसी के साथ लोभ भी निरंतर बढ़ता जाता है। इसको समझाते हुए उन्होंने आगे बताया कि जैसे समुद्र का खड्डा हजारों नदियों के पानी से नहीं भरता है, शमशान का खड्डा हजारों मुर्दों के जल जाने के बाद भी नहीं भरता है, पेट का खड्डा कितनी भी बार खा लो तो भी नहीं भरता है इसी तरह लोभ का खड्डा भी कितनी भी संपदा मिल जाय तो भी नहीं भरता है अतः हमें अपने लोभ को सीमित करते हुए इच्छाओं को कम करने का पुरुषार्थ करना चाहिए। ज्यों ज्यों हम लोभ कम करेंगे वैसे वैसे हम महसूस करेंगे कि हमारा आंतरिक सुख बढ़ता जा रहा है अतः हमें लोभव्रत्ति को कम करने हेतु सजग रहना चाहिए।
इससे पूर्व साध्वी सत्यप्रभा ने कहा कि साधक का आचार और आहार दोनों संयमित होते हैं तो वो आत्म साधना आराधना के माध्यम से कर्म निर्जरा करता हुआ आध्यात्मिक विकास की यात्रा में आगे से आगे बढ़ाता जाता है। महासती पुण्यप्रिया ने ठानांग सूत्र के चौथे ठाणे में वर्णित चार प्रकार की बुद्धि विषयक जानकारी दी। आज़ धर्म सभा में रायपुर छत्तीसगढ़ से पन्नालाल श्रीश्रीमाल परिवार एवम् अन्य स्थानीय सुज्ञजन उपस्थित रहे। साध्वी रत्ना राजश्री जी म सा ने विभिन्न प्रत्याख्यान कराने के बाद मंगल पाठ सुनाया। संचालन संघ मंत्री इंद्रेश कोठारी ने किया।