बेगूं। क्षेत्र में स्थित जोगणियां माताजी मंदिर में पहले मन्नत पूरी होने पर लोग अपने मुंह की जुबान काटकर चढ़ाते थे, जिससे मानव जीवन को गंभीर संकट होता था। 128 साल पहले बेगूं के तत्कालीन रावजी के आदेश पर इस प्रथा को समाप्त किया गया। इसके अलावा, 50 साल पहले मंदिर में पशु बलि की प्रथा को भी बंद कर दिया गया, जिससे यह मंदिर शुद्ध और पवित्र स्थल बन गया।
128 साल पहले बेगूं रावजी ने जारी किया था फरमान
जोगणियां माता मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थित शिव मंदिर के शिलालेख के अनुसार, 4 दिसंबर 1896 (विक्रम संवत 1953) में जुबान काटने की प्रथा को पूरी तरह से बंद कर दिया गया। मेवाड़ राज्य के बेगूं ठिकाने के तत्कालीन रावजी द्वारा यह आदेश जारी किया गया था। इसमें बताया गया था कि जहाजपुर और बिजौलिया के लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर जुबान काटकर माताजी को चढ़ाते थे, जिससे व्यक्ति के मरने का खतरा रहता था। इसे रोकने के लिए यह फरमान जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि कोई भी व्यक्ति ऐसी मान्यता के तहत जुबान चढ़ाने का कार्य नहीं करेगा। अगर किसी ने ऐसा किया, तो उसे दंडित किया जाएगा।
जोगणियां माता मंदिर का इतिहास
माना जाता है कि जोगणियां माता मंदिर लगभग 1200 साल पुराना है। 9वीं शताब्दी में बंबावदा गढ़ पर हाड़ा वंश का शासन था और जोगणियां माता को हाड़ा वंश की कुलदेवी माना जाता है। मंदिर परिसर में प्राचीन शिव मंदिर और भैरव मंदिर भी स्थित हैं। 1974 में यहां पशु बलि को भी पूरी तरह बंद कर दिया गया। इसके बाद, 1975 में राजस्थान सरकार ने पशु बलि निषेध कानून लागू किया, जो सभी मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर लागू हुआ।
पशु बलि निषेध में रामचंद्र शर्मा अग्रणी भूमिका में?
बेगूं निवासी देवीलाल कोठारी ने बताया कि पहलवान मास्टर स्व. रामचंद्र शर्मा, पुत्र बद्रीलाल शर्मा, जोगणियां माता में पशु बलि बंद कराने में महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। जब जोगणियां माताजी में पशु बलि निषेध की बैठक बुलाई गई, तो उन्होंने खेत में खड़ी फसल को छोड़कर इस आंदोलन में हिस्सा लिया। पहले लोग मन्नत पूरी होने पर भैंस, बकरे और मुर्गे की बलि चढ़ाते थे, लेकिन शर्मा ने इसके खिलाफ संघर्ष शुरू किया और इसे रोकने में सफलता प्राप्त की।
बकरे की बलि के विरोध में साहसिक कदम
एक बार बकरे की बलि को लेकर विवाद हुआ, तब मास्टर रामचंद्र शर्मा ने अपनी जान की परवाह किए बिना कहा कि बकरे की बलि से पहले मेरी गर्दन काटी जाएगी। इस साहसिक कदम के बाद बलि देने वालों ने अपने कदम पीछे खींच लिए और करीब 100 बकरों को उस दिन बलि से मुक्त किया गया।
समाज में सुधार और अहिंसात्मक आंदोलन
रामचंद्र शर्मा ने पशु बलि बंद कराने के साथ-साथ जोगणियां माता मंदिर परिसर को साफ-सुथरा और पवित्र बनाने का काम किया। उनके इस अभियान में जैन साध्वी यश कंवरजी की प्रेरणा महत्वपूर्ण रही। जोगणियां माता शक्तिपीठ संस्थान के अध्यक्ष स्व. भंवरलाल जोशी के नेतृत्व में जन-जागरण अभियान चलाया गया। 1974 में मंदिर में पूरी तरह से पशु बलि बंद कर दी गई।
रामचंद्र शर्मा का स्वर्गवास 4 अप्रैल 1974 को हुआ। उनकी स्मृति में जोगणियां माता संस्थान द्वारा मंदिर के बाहर उनकी प्रतिमा स्थापित की गई है।