मनासा। रामपुरा तहसील के चचौर क्षेत्र के पास छोटा सा ग्राम है सांगाखेड़ा। जहां 300 साल पुराना माताजी का मंदिर है। मंदिर में पूजन रावत समाज के लोग कर रहे हैं। यहां पुजारी ब्राह्मण नहीं रावत समाज से ही है।
जिला मुख्यालय से 67 किमी दूर नीमच-गांधीसागर मार्ग स्थित सांगाखेड़ा गांव के लिए चचौर और देवरान से आवाजाही के लिए पक्का रास्ता है। गांव में कभी एक छोटा सा मंदिर था। मंदिर में देवी की सांगाखेड़ा माताजी की प्रतिमा स्थापित है और दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। इतिहासकार पूरण सहगल बताते हैं शक्ति का यह स्थान चमत्कारिक हैं। रावत मीणा समाज के परिवारों की बस्ती है। जो बारी-बारी से देवी का पूजन करते हैं। पुजारी घीसालाल रावत कहते हैं नवरात्रि में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। रोज महाआरती के साथ पूजन होता है। महाष्टमी और नवमी को महायज्ञ व कन्याभोज कराया जाता है। साथ ही मेले का आयोजन भी होता है। आसपास के गांवों के साथ दूर-दूर से श्रद्धालु नवरात्रि में पैदल आते हैं। मान्यता है मंदिर मन्नत मांगने पर मां मुरादें पूरी करती है। माता सुबह बाल रूप, युवा रूप,और शाम समय प्रौढ़ रूप में दर्शन देती है। मंदिर में कोढ़ ,लकवा और अन्य बीमारियों से ग्रसित मरीज ठीक होते हैं। निसंतान दंपती की झोली भरती है। रामपुरा तहसील के चचौर क्षेत्र के सांगाखेड़ा गांव में स्थित 300 वर्ष पुराना माता का मंदिर।
अकबर ने देखा था चमत्कार, जब मंदिर पूर्व से पश्चिम में हो गया
मंदिर को लेकर क्षेत्र के गांवों में कई किवंदतियां प्रचलित है। कहा जाता है देवी की प्रतिमा करौंदी के एक पेड़ के नीचे थी।बाद में रावत समाज ने मंदिर बना दिया। एक बार मंदिर में राजा अकबर महाराणा प्रताप की तलाश में भटकते हुए आया। मन ही मन वापस लौट जाने की भावना हुई और उसने देवी से कहा अगर आज रात में मैंने कोई बड़ा चमत्कार देख लिया तो वापस लौट जाऊंगा। रात में अकबर सो गया और सुबह उठा तो मंदिर का मुंह पूर्व में पश्चिम दिशा में हो गया था। आज भी मंदिर पश्चिम दिशा में है। इतिहासकार सहगल का कहना है हालांकि इतिहास में इसका कोई उल्लेख नहीं है।