मनासा। देवरी खवासा पूर्वजों के समय से चल रही है या अनूठी प्रथा श्राद्ध करने की जो कि आज भी सुचारू रूप से यह परंपरा चल रही है दीपावली के लक्ष्मी पूजन के दिन गुर्जर समाज के लोगों के द्वारा गांव के पास कुएं पर जाकर अपने घर से पकवान बनाकर ले जाया जाता है। वहीं उसे कुएं पर जाकर हवन ध्यान कर पूर्वजों को श्रद्धा पर तर्पण कर उनका भोजन कर बाद में सामूहिक भोजन किया जाता है। समाज के द्वारा यह प्रश्न था 350 सालों से दीपावली के दिन श्रद्धा मनाने की प्रथा चली आ रही है। उसी को लेकर समाज के वरिष्ठ जनों ने जानकारी दी है कि 16 श्रद्धा ना करते हुए की जो 2 दिन का श्राद्ध होता है दीपावली के पूर्व से रखा जाता है श्रद्धा वह कुएं पर जाकर हवन ध्यान कर समाप्त होता है श्रद्धा उसके बाद में गुजर समाज के लोगों के द्वारा लक्ष्मी पूजन शाम को किया जाता है उससे पहले कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है इस श्रद्धा के कार्यक्रम में वरिष्ठ जन युवा वर्ग व बच्चे लोग शामिल होते हैं और अपने पुर्जों का श्राद्ध व तर्पण करते हैं।
गुर्जर ने बताया कि जहां कहीं भी गुर्जर समाज के लोग रहते हैं, वे दीपावली के दिन खीर चूरमा का भोग बनाते हैं. थाली में भोग लेकर सभी परिवार के लोग झील तालाब, नदी किनारे या कुएं पर एकत्रित होते हैं. उसके बाद सभी की थाली से थोड़ा-थोड़ा भोग एक थाली में निकाल लिया जाता है. सभी लोग मिलकर अपने पूर्वजों को याद करते हैं. उसके बाद घास की एक बेल बनाई जाती है जिसे पानी में डाला जाता है और परिवार के लोग इस बेल को हाथों से छूते हैं।
स्थानीय गुर्जर समाज से मदनलाल पटेल अंबाराम गुर्जर सरपंच (प्रतिनिधि) गुर्जर मानसिंह गुर्जर ने बताया कि पीढ़ी दर पीढ़ी दीपावली के दिन पूर्वजों का श्राद्ध एवं तर्पण किये जाने की परंपरा गुर्जर समाज में सदियों से है. नीमच जिले में जहां भी गांव- में गुर्जर समाज के लोग रहते हैं. वह दीपावली के दिन अपने पूर्वजों को याद करना और उनका श्राद्ध मनाना नहीं भूलते हैं. हमने अपने पिता और दादा के समय से ही परिवार में दीपावली के दिन पूर्वजों का श्राद्ध मनाने की परंपरा देखी है. इस दिन कुटुम्ब में जितने भी दादा, भाई, चाचा, ताऊ का परिवार है. वे सभी लोग एक जगह पर पूर्वजों का आशीर्वाद लेकर एक-दूसरे के घरों में बनाया हुआ भोजन आपस में मिलकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं. इससे आपस में प्रेम बढ़ता है. उन्होंने बताया कि इस दौरान काचरे की बेल भी लगाई जाती है. माना जाता है कि जिस प्रकार काचरे की बेल बढ़ती है, उसी प्रकार उनका वंश भी बढ़ता रहे।